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साहित्यिक वीथिका: जब आचार्य चतुरसेन ने साहित्य की 'छुईमुई' दुल्हन के समक्ष राजसत्ता को दिखाया आईना - द वॉचमैन पोस्ट

विवेक मेहता 18 April, 2026

प्रस्तुति: विवेक मेहता

स्वतंत्रता के पश्चात पंजाब में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' का एक भव्य आयोजन हुआ। सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष डॉ. सत्यपाल ने तत्कालीन ख्यात उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री को अतिथि के रूप में निमंत्रित किया था। उस दौर में शास्त्री जी अपने कालजयी उपन्यासों 'वैशाली की नगरवधू', 'गोली' और 'सोमनाथ' के कारण साहित्य जगत के शिखर पर थे।

भीड़ में अकेला साहित्यकार
देश में यह विडंबना सदैव रही है कि कला और साहित्य के मंचों पर भी मुख्य आकर्षण अक्सर राजनेता ही होते हैं। इस सम्मेलन के उद्घाटनकर्ता लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री गणेश वासुदेव मावलंकर थे। नियति देखिए, जिस रेलगाड़ी से मावलंकर जी पंजाब पहुँचे, उसी में शास्त्री जी भी सवार थे। 
स्टेशन पर दृश्य चौंकाने वाला था। मावलंकर जी का स्वागत पुष्प-वर्षा और गाजे-बाजे के साथ राजकीय ठाठ से हुआ। वहीं, हिंदी साहित्य का यह यशस्वी हस्ताक्षर प्लेटफार्म पर अपने सामान के साथ एकाकी खड़ा इस कोलाहल को देख रहा था। भीड़ छंटने के बाद एक स्वयंसेवक ने औपचारिकता निभाते हुए उन्हें रिक्शे में बैठाकर उनके विश्राम स्थल तक पहुँचा दिया।

साहित्य की 'छुईमुई' दुल्हन
शाम को मुख्य कार्यक्रम में भी वही स्थिति दोहराई गई। मंच पर मावलंकर जी का स्वागत राजकीय सम्मान के साथ हुआ, जबकि एक कोने में बैठे शास्त्री जी की ओर किसी का विशेष ध्यान नहीं गया। भव्य भाषणों और औपचारिकताओं के बाद जब वातावरण पूरी तरह उल्लास से भर गया, तब अंत में शास्त्री जी से 'मंगल वचन' कहने का अनुरोध किया गया।
स्वाभिमानी आचार्य चतुरसेन शास्त्री जब माइक पर पहुँचे, तो उनकी वाणी में व्यंग्य की ऐसी धार थी जिसने पूरे पंडाल को हिला दिया। उन्होंने अत्यंत शांत और प्रसन्न स्वर में कहा-
"मावलंकर जी की इस बारात में आकर मुझे असीम प्रसन्नता हुई। दूल्हा तो निसंदेह सुंदर है ही, बारात भी खूब सजी है और प्रबंध भी शानदार है। परंतु, इस धूमधाम और शोर-शराबे से 'साहित्य रूपी दुल्हन' ऐसी डर गई है कि वह छुईमुई सी घूँघट में लिपटी कहीं दबी बैठी है। वह मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दे रही।"

मौन हो गया मंच
शास्त्री जी का यह मार्मिक और तीखा कटाक्ष सीधे श्रोताओं के दिल में उतरा और पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। जहाँ श्रोता इस सत्य के कायल थे, वहीं आयोजकों और मंच पर बैठे विशिष्ट जनों के चेहरों पर सन्नाटा पसर गया।

यह प्रसंग आज भी प्रासंगिक है, जो हमें याद दिलाता है कि जब साहित्य के आंगन में राजसत्ता का वैभव अधिक चमकने लगे, तो वहाँ से साहित्य की आत्मा लुप्त होने लगती है।

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