कपिलसिंह चौहान
08 June, 2026
राजनीति
भोपल/नीमच (कपिल सिंह चौहान) मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा का चुनाव, जो आमतौर पर केवल एक औपचारिक और नीरस प्रक्रिया माना जाता था, इस बार एक बेहद दिलचस्प और हाई-प्रोफाइल सियासी ड्रामे में तब्दील हो चुका है। सूबे की तीन राज्यसभा सीटों के लिए मैदान में चार उम्मीदवारों के उतरने से न केवल चुनावी गणित को उलझा दिया है, बल्कि परदे के पीछे होने वाली जोड़-तोड़ की राजनीति को भी हवा दे दी है। भाजपा की ओर से तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल के बाद तीसरे उम्मीदवार के रूप में बुंदेलखंड के ओबीसी चेहरे महेश केवट मैदान में हैं, तो वहीं कांग्रेस ने अपनी कद्दावर नेता और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को उतारकर मुकाबले को आमने-सामने का बना दिया है।
अनुशासन बनाम अवसरवाद: महेश केवट की उम्मीदवारी पर उठते सवाल
इस पूरे चुनाव में सबसे चौंकाने वाला और बहस का केंद्र बनने वाला नाम है- महेश केवट का। केवट का राजनीतिक सफर किसी रोलर-कोस्टर राइड से कम नहीं रहा है। कल तक जिन पर नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा के ही अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ काम करने के गंभीर आरोप थे और जिन्हें अनुशासनहीनता के चलते संगठन ने 6 साल के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, आज उनकी 'बल्ले-बल्ले' है। पहले संगठन में वापसी, फिर अप्रैल में मछुआ कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बनना और अब सीधे देश की सबसे बड़ी पंचायत (दिल्ली) का टिकट मिल जाना, भाजपा के भीतर ही कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि 'शुचिता और अनुशासन' का ढोल पीटने वाली कैडर-बेस्ड पार्टी में क्या अब अनुशासनहीनता ही योग्यता का नया पैमाना बन गई है?
10 वोटों की खाई: शुचिता का दावा और सेंधमारी की आशंका
मप्र की 230 सीटों की विधानसभा में विजयपुर सीट रिक्त होने और बीना से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीती निर्मला सप्रे के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत मामला चलने से चुनावी गणित को देखें तो विधानसभा की प्रभावी संख्या 228 है। जिसके चलते एक उम्मीदवार को जीतने के लिए 58 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता है। भाजपा के पास 164 विधायक हैं। अपने पहले दो उम्मीदवारों को जिताने के बाद भाजपा के पास महज 48 वोट बचते हैं। यानी, तीसरे उम्मीदवार महेश केवट की नैया पार लगाने के लिए भाजपा को कम से कम 10 अतिरिक्त वोटों की दरकार है।
अब सवाल यह उठता है कि नीति और नैतिकता की बात करने वाली भाजपा ये 10 वोट कहाँ से लाएगी? जाहिर है, बिना खरीद-फरोख्त या कांग्रेस खेमे में सेंधमारी के यह मुमकिन नहीं है। चर्चा तो यहाँ तक है कि भाजपा ने कांग्रेस में इस 'ऑपरेशन सेंधमारी' की कमान उन्हीं नेताओं और विधायकों को सौंपी है, जो कुछ समय पहले खुद कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे।
बाड़ेबंदी की तैयारी और कांग्रेस के पास 'नजीर' पेश करने का मौका
इस संभावित हॉर्स-ट्रेडिंग और क्रॉस-वोटिंग के खतरे को भांपते हुए कांग्रेस खेमे में भी हलचल तेज है। हालांकि कांग्रेस के अंदर मीनाक्षी नटराजन के नाम को लेकर कुछ हलकों में असंतोष की खबरें हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी और उमंग सिंघार जैसे दिग्गज नेता एक सुर में एकजुटता के दावे कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो अपने कुनबे को बिखरने से बचाने के लिए कांग्रेस चुनाव से ठीक पहले अपने विधायकों की बाड़ेबंदी कर किसी अज्ञात सुरक्षित स्थान पर भेजने की तैयारी में है।
देखा जाए तो इस समय कांग्रेस विधायकों के पास सत्तारूढ़ भाजपा का गुरुर तोड़ने और मीनाक्षी नटराजन को जिताकर अपनी एकजुटता की एक बड़ी नजीर पेश करने का ऐतिहासिक अवसर है। यदि कांग्रेस अपने सभी विधायकों को एकजुट रख पाती है, तो वह अपनी यह एक सीट आसानी से बचा लेगी।
नीमच-मंदसौर का क्षेत्रीय हित और 'सत्ता संतुलन'
इस चुनाव का एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू नीमच-मंदसौर संसदीय क्षेत्र के स्थानीय समीकरणों से जुड़ा है। वर्तमान में इस क्षेत्र से सुधीर गुप्ता लोकसभा सांसद हैं, जबकि भाजपा के ही बंशीलाल गुर्जर पहले से ही राज्यसभा सदस्य हैं और इसी माटी के बाशिंदे हैं।
यदि मंदसौर निवासी और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा के जरिए संसद पहुंचती हैं, तो इस अंचल को दोहरा लाभ मिलेगा:
मध्य प्रदेश का यह राज्यसभा चुनाव महज तीन सांसदों को चुनने का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा की 'नैतिकता' और कांग्रेस की 'एकजुटता' का लिटमस टेस्ट बन चुका है। क्या भाजपा 10 वोटों का जुगाड़ कर तीसरी सीट झटकेगी या कांग्रेस अपना किला बचाने में कामयाब होगी? इसका फैसला आने वाले दिनों की शह और मात की राजनीति तय करेगी।