डेस्क न्यूज़
06 June, 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के भीतर सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब एक भीषण राजनीतिक दावानल में बदल चुकी है। 294 सदस्यीय विधानसभा में महज 80 सीटों पर सिमट जाने वाली टीएमसी का संकट उस समय और गहरा गया, जब पार्टी के 58 विधायकों ने खुलकर बगावत कर दी। तीन दशकों से पार्टी पर एकछत्र राज करने वाली मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के पैरों तले राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है। शुक्रवार को उनके कालीघाट (कोलकाता) स्थित आवास पर बुलाई गई आपातकालीन बैठक में गैर-बागी विधायकों में से केवल 8 विधायक ही शामिल हुए, जो ममता बनर्जी की कमजोर होती पकड़ का स्पष्ट संकेत है।
बैठक का फीका गणित: शीर्ष नेतृत्व की बढ़ी चिंताएं
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, संकट से जूझ रही पार्टी आलाकमान द्वारा बुलाई गई इस समीक्षा बैठक में कुल 80 विधायकों में से केवल बीना मोंडल, आशिमा पात्रा, मदन मित्रा, कुणाल घोष, फिरहाद हकीम, शोभनदेब चट्टोपाध्याय, बिमान बनर्जी और अशोक कुमार देब ही पहुंचे। हालांकि, इस बैठक में लोकसभा और राज्यसभा के कुछ प्रमुख सांसदों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें डोला सेन, माला रॉय, कल्याण बनर्जी, अभिषेक बनर्जी, डेरेक ओ'ब्रायन और सुदीप बंद्योपाध्याय शामिल थे। गौरतलब है कि टीएमसी के पास वर्तमान में लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं, जिनके बीच भी भीतर ही भीतर सुगबुगाहत तेज है।
रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में ऐतिहासिक विभाजन
इस बड़े राजनीतिक तख्तापलट के सूत्रधार पूर्व छात्र नेता और हाल ही में निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी हैं। रितब्रत बनर्जी ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद खुद को मुख्य विपक्षी दल का नेता घोषित कर दिया, जिससे पार्टी में आधिकारिक रूप से वर्टिकल विभाजन हो गया है। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी द्वारा बनाई गई टीएमसी के 30 साल के इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी और पहली वास्तविक टूट है।
दिलचस्प बात यह है कि टीएमसी के 34 मुस्लिम विधायकों में से लगभग आधे विधायकों का समर्थन रितब्रत बनर्जी को प्राप्त है। रितब्रत बनर्जी, जिन्हें 2017 में माकपा (CPI-M) से निष्कासित किया गया था और बाद में 2024 में टीएमसी के समर्थन से राज्यसभा भेजा गया था, अब ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
"हम उन 58 विधायकों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो टीएमसी के सिंबल पर जीतकर आए हैं। विधानसभा के भीतर अब हम ही वास्तविक तृणमूल कांग्रेस हैं। हमारे इस दावे को विधानसभा अध्यक्ष ने भी स्वीकार कर लिया है।"- रितब्रत बनर्जी (बागी गुट के नेता)
अभिषेक बनर्जी के खिलाफ गुस्सा, ममता को 'सलाहकार' बनाने की पेशकश
बागी विधायकों का रुख ममता बनर्जी के प्रति बेहद कूटनीतिक लेकिन कड़ा है। विद्रोहियों ने स्पष्ट किया है कि वे ममता बनर्जी से पार्टी की "मुख्य सलाहकार" बनने का आग्रह करेंगे, लेकिन उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ उनका कोई संवाद या वास्ता नहीं रहेगा। 2016 के बाद से पार्टी में दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ विधायकों का यह असंतोष लंबे समय से सुलग रहा था, जो अब इस बगावत के रूप में सामने आया है।
सड़क से अदालत तक कानूनी लड़ाई की तैयारी
दूसरी ओर, ममता बनर्जी की आधिकारिक तृणमूल कांग्रेस इस विभाजन को अवैध ठहराने की पूरी कोशिश कर रही है। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी नेता रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने के फैसले के खिलाफ ममता गुट कानूनी कदम उठाने जा रहा है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और कानूनी विशेषज्ञ कल्याण बनर्जी ने इस फैसले को पूरी तरह "गैरकानूनी" करार दिया है।
कालीघाट बैठक के बाद कल्याण बनर्जी ने संवाददाताओं से कहा, "स्पीकर द्वारा नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति पूरी तरह से असंवैधानिक है। हम इसके खिलाफ आगामी सोमवार को उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करने जा रहे हैं।" इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर भी टीएमसी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने और झूठे मामलों में फंसाने का आरोप लगाया। कल्याण बनर्जी ने हुंकार भरते हुए कहा कि पार्टी इस राजनीतिक और कानूनी लड़ाई को सड़कों से लेकर अदालत के गलियारों तक लड़ेगी।
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर है। जहां एक तरफ ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बागी गुट खुद को असली टीएमसी साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। कानूनी दांवपेंच और सड़क के संघर्ष के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की 'दीदी' इस चक्रव्यूह से अपनी पार्टी को कैसे बाहर निकालती हैं।