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विशेष रिपोर्ट: 'ब्रूनो' पालतू कुत्ता नहीं, परिवार का सदस्य था...नीमच के इस परिवार ने बेजुबान की मौत पर रच दिया इंसानी संवेदनाओं का अनूठा इतिहास

पंकज मलिक 12 July, 2026 अन्य

नीमच। अक्सर लोग पालतू जानवरों को शौक के लिए रखते हैं, लेकिन नीमच के प्राचार्य बालकिशन बनोधा के परिवार ने यह साबित कर दिया कि प्रेम का रिश्ता खून से नहीं, अपनेपन और संवेदनाओं से बनता है। उनके लिए पालतू श्वान "ब्रूनो" कोई जानवर नहीं, बल्कि परिवार का एक सबसे प्यारे सदस्य सा था। उसके निधन के बाद जिस तरह पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार, बारहवां, हवन और स्मारक का निर्माण किया गया, वह हर किसी की आंखें नम कर देता है।
35 दिन का नन्हा ब्रूनो, जो परिवार की धड़कन बन गया
7 फरवरी 2021 को बनोधा परिवार ब्रूनो को उज्जैन से अपने घर लेकर आया था। उस समय वह महज 35 दिन का था। धीरे-धीरे उसने पूरे परिवार के दिलों में ऐसी जगह बना ली कि चार बच्चों वाले इस परिवार में वह भी बेटे की तरह शामिल हो गया।

नीमच गर्ल्स स्कूल के प्राचार्य बालकिशन बनोधा बताते हैं कि ब्रूनो को कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता था। यदि किसी शादी या पारिवारिक कार्यक्रम में जाना होता तो परिवार का कोई सदस्य उसके साथ गाड़ी में ही रुक जाता था। उसकी खुशी, खान-पान, देखभाल और दिनचर्या का पूरा ध्यान रखा जाता था। वह भी परिवार के हर सदस्य के सुख-दुख का साथी बन गया था।

बीमारी से जंग... लेकिन हार गया ब्रूनो
करीब डेढ़ महीने पहले ब्रूनो की तबीयत बिगड़ने लगी। उसे बेहतर इलाज के लिए 1 जून को उदयपुर और फिर 5 जून को इंदौर के प्रसिद्ध पेट क्लिनिक ले जाया गया। जांच में पता चला कि उसे कैंसर है। इलाज शुरू हुआ। दो थेरेपी भी हुईं। परिवार को उम्मीद थी कि उनका लाड़ला फिर से स्वस्थ होकर घर लौटेगा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 29 जून को उसे घर लाया गया और उसी रात उसने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।

घर में पसरा मातम, हर आंख हुई नम
ब्रूनो की मौत के बाद बनोधा परिवार पूरी तरह टूट गया। परिवार के सदस्यों की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो घर का कोई अपना हमेशा के लिए बिछड़ गया हो। लेकिन परिवार ने केवल शोक ही नहीं मनाया, बल्कि उसे वही सम्मान दिया जो किसी प्रिय परिजन को दिया जाता है।

अंतिम संस्कार, बारहवां और स्मारक... प्रेम की अनोखी मिसाल
ब्रूनो का पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया गया। उसकी आत्मा की शांति के लिए घर में प्रार्थना सभा और हवन हुआ। परंपरा के अनुसार उसका बारहवां भी आयोजित किया गया।

जहां उसे दफनाया गया, वहां उसकी स्मृति में एक सुंदर स्मारक बनाया गया। आज भी परिवार के सदस्य वहां फूल अर्पित कर उसे श्रद्धांजलि देते हैं। स्मारक पर लिखी भावुक पंक्तियां हर आने-जाने वाले को भावुक कर देती हैं
 "तुमसे बिछड़कर यह घर तो सूना हो गया, पर तेरी यादों का बसेरा इस दिल में हमेशा रहेगा।"

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, समाज के लिए संदेश 
ब्रूनो की कहानी केवल एक पालतू श्वान के निधन की कहानी नहीं है। यह उस संवेदनशीलता की मिसाल है, जिसकी आज समाज को सबसे अधिक जरूरत है। बेजुबान पशु बोल नहीं सकते, लेकिन उनका प्रेम, विश्वास और वफादारी जीवनभर साथ निभाती है। वे परिवार से केवल भोजन नहीं, अपनापन चाहते हैं।

ऐसे समय में जब पशुओं के साथ क्रूरता की घटनाएं सामने आती रहती हैं, बनोधा परिवार का यह व्यवहार बताता है कि मानवता केवल इंसानों के प्रति नहीं, बल्कि हर जीव के प्रति सम्मान और करुणा में बसती है।

एक संदेश, जो हर दिल तक पहुंचे
प्राचार्य बालकिशन बनोधा के परिवार ने अपने आचरण से यह संदेश दिया है कि-
"पशु हमारे जीवन का हिस्सा हैं, खिलौना नहीं। उन्हें प्रेम दें, सम्मान दें और उनके जीवन का भी उतना ही मूल्य समझें जितना अपने प्रियजनों का। इंसान की असली पहचान इस बात से होती है कि वह बेजुबानों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"

ब्रूनो अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन ब्रूनो और बनोधा परिवार के निश्चल प्रेम ने एक ऐसी सीख छोड़ दी है, जो आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि प्रेम की कोई भाषा, जाति या प्रजाति नहीं होती। जहां सच्चा अपनापन होता है, वहीं परिवार बसता है।  

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