कपिलसिंह चौहान
10 July, 2026
सामाजिक
-कपिल सिंह चौहान । द वॉचमैन पोस्ट
धर्म का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सरलता, सहजता और समरूपता है। संतो के प्रवचन और सानिध्य किसी निमंत्रण-पत्र के मोहताज नहीं, किसी पदनाम के आकांक्षी नहीं और किसी प्रोटोकॉल की प्रतीक्षा भी नहीं करते । एक संत के वचनों का श्रोता किसान, मजदूर, व्यापारी, मंत्री और साधारण गृहस्थ भी है, जो केवल दो पल आत्मिक शांति की अनुभूति कि तलाश में है, और वही संत वाणी के वास्तविक पात्र हैं ।
प्राचीन काल से नदी के घाट हों, किसी पीपल की छांव, गांव का चौक, मेला, मैदान या कुंभ, जहाँ संत बैठे, वहाँ जिसने सुनना चाहा, वह बैठ गया। जिसने प्रश्न पूछा, उसे उत्तर मिला। जिसने दर्शन चाहे, वह बिना परिचय के पहुँच गया। संत सदैव सत्ता से बड़े होते हैं और उनके दरबार में मंत्री और मजदूर के बीच कोई दीवार नहीं होती थी। किन्तु समय बदल रहा है। धार्मिक आयोजन अब केवल प्रवचन नहीं रह गए हैं; वे सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक उपस्थिति और सार्वजनिक प्रभाव के भी बड़े मंच बनते जा रहे हैं।
नीमच में महामंडलेश्वर स्वामी श्री कैलाशानंद जी का आयोजन भी अनेक कारणों से चर्चा का विषय है। कारण केवल संत का आगमन नहीं, बल्कि उस आयोजन की संरचना है, जिसने स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्नों को जन्म दिया है। सबसे पहले दृष्टि निमंत्रण-पत्र पर जाती है। उसमें संत के आगमन जितनी ही प्रमुखता से अतिथियों की संख्या का विस्तार भी है। केंद्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, सांसद, विधायक, पूर्व मंत्री, उद्योगपति, फिल्म अभिनेता, सामाजिक संगठन, विशाल आयोजन समिति, सहयोगी संस्थाएँ, मानो पूरा सामाजिक शक्ति-संतुलन एक ही मंच पर समेट देने का प्रयास हो। यह दृश्य किसी लोकतांत्रिक समाज में असामान्य भी नहीं है। प्रभावशाली व्यक्तित्वों का संतों से जुड़ना भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। किंतु प्रश्न तब उठता है जब आयोजन का केंद्र प्रवचन से हटकर विशिष्ट व्यक्तियों की विस्तारित सूची बनने लगे।
पूरा निमंत्रण पढ़ने के बाद एक क्षण के लिए लगता है कि यह किसी एक दिवसीय अल्पकालिक प्रवचन का नहीं बल्कि किसी राष्ट्रीय सम्मेलन का आमंत्रण है । लेकिन गौर करिए कि आयोजन स्थल छोटा सा टाउन हॉल है। जहां अतरिक्त कुर्सियां लगाने पर अधिकतम छह सौ पचास लोग बैठ सकते हैं ठीक से । अब केवल निमंत्रण-पत्र में प्रकाशित विशिष्ट व्यक्तियों, आयोजकों और समिति सदस्यों की संख्या ही दो सौ चालीस से अधिक है । आयोजन में लगभग 14 संत एवं धर्माचार्य, 37 मुख्य अतिथि, 30 विशिष्ट अतिथि, 100 से अधिक आयोजन समिति के सदस्य, 55 सदस्यीय चौपड़ा परिवार और सहयोगियों में 60 सामाजिक, धार्मिक एवं व्यापारिक संस्थाओ का उल्लेख है… इन संस्थाओं के दो-दो व्यक्ति भी पहुंचे तो 300 पार हो गए, इसके बाद टाउनहॉल की क्षमता अनुसार मात्र 300 अन्य श्रद्धालु ही प्रवचन का लाभ ले पायेंगे सम्पूर्ण नीमच जिले के।
तो यह तो समझ आता है कि राष्ट्र उत्थान, सामजिक कल्याण और विश्व शान्ति हेतु आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री कैलाशानंद जी महाराज का दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन का यह आयोजन सामान्य श्रद्धालुओं के लिए नहीं है। आयोजन में विशिष्टों की संख्या प्रमाणित करती है कि कैलाशानन्द जी के रोड शो से उनकी कुछ झलक ही नीमच के सामान्य श्रद्धालुओं के हिस्से में आई है।
जब आमंत्रित अतिथियों की संख्या ही इतनी विस्तृत हो, जब उनके साथ आने वाले सहयोगी, सुरक्षा व्यवस्था, स्वागतकर्ता, समिति सदस्य और विशेष आमंत्रित भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हों, तब सहज ही मन पूछता है कि-
उस सामान्य श्रद्धालु के लिए स्थान कहाँ है, जिसका ह्रदय संत वाणी श्रवण के लिए अगाध श्रद्धा से भरा है?
स्वामी कैलाशानंद गिरि जी के आधिकारिक सोशल मीडिया पेज को देखें तो उनकी पिछले दो सप्ताह की 10 पोस्ट इस विमर्श को और रोचक बनाती हैं। स्वामी जी के पेज पर एक पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है।
उनकी हाल ही की एक पोस्ट में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा हैं, दूसरी पोस्ट में भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री, कहीं मुख्यमंत्री योगी के प्रमुख सलाहकार, कहीं सांसद, कहीं आईएएस, आईपीएस, आईआरएस अधिकारी, कहीं न्यायाधीश, फिर एक बड़े उद्योगपति, फिर कॉर्पोरेट समूहों के शीर्ष अधिकारी, कहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी, और लेटेस्ट पोस्ट कल्कि धाम के शिलान्यास कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज जी हैं।
एक पोस्ट यह भी है जिसमें बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से डीजल-पेट्रोल की बचत, पर्यावरण संरक्षण एवं राष्ट्रहित में एक वाहन से सामूहिक यात्रा करने की अपील का अनुसरण वे भी कर रहे हैं।भले इन पोस्टों में प्रमुखता स्वामी जी के साथ विशिष्ट व्यक्तियों के आगमन, भेंट, सम्मान और आशीर्वाद को दी गई दिखाई देती है लेकिन साथ ही उनकी अन्य रील्स में उनका हजारों श्रद्दालुओं से आत्मिक साहचर्य भी दिखाई दे रहा है।
यदि किसी संत का सार्वजनिक आभामंडल इतना व्यापक है कि उसके सान्निध्य में राष्ट्रों के पूर्व राष्ट्रपति से लेकर केंद्रीय मंत्री तक आते हैं, तो क्या उस संत के प्रवचन को सुनने का अवसर भी उतना ही व्यापक नहीं होना चाहिए?
नीमच में हेलिकॉप्टर्स की गूंज, करोड़ों के खर्च, समस्त समाजिक संगठनों की सूची, शहर भर की साज सज्जा और तामझाम के बावजूद नीमच में मात्र 650 लोग ही उनके प्रवचनों का लाभ ले पाएंगे। यह टीस आम श्रद्धालुओं के मन में रहेगी।
यह किसी प्रकार की आलोचना नहीं है। जब किसी संत की सार्वजनिक छवि लगातार प्रभावशाली व्यक्तियों के बीच निर्मित होती है, तब सामान्य श्रद्धालु के मन में यह स्वाभाविक आकांक्षा भी जन्म लेती है कि उसे भी उसी सहजता से दर्शन, श्रवण और संवाद का अवसर मिले। और यहीं से प्रवचन और Event के बीच का सूक्ष्म अंतर प्रारंभ होता है।
यदि पाँच हजार लोग सुन सकते थे और केवल छह सौ पचास सुन पाएँ, तो प्रश्न आयोजन की भव्यता पर नहीं, उसकी प्राथमिकता पर उठता है। क्योंकि संत का संदेश जितना अधिक लोगों तक पहुँचे, उतना ही उसका उद्देश्य पूर्ण होता है। यह लेख किसी संत की तपस्या पर प्रश्न नहीं उठाता। ना ही आयोजकों पर प्रश्न चिन्ह लगता है। प्रश्न केवल आयोजन की अवधारणा पर है।
क्या आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा लाभ विशिष्ट आमंत्रितों को मिलना चाहिए या उस सामान्य व्यक्ति को, जिसने शायद महीनों से केवल एक बार संत के दर्शन और प्रवचन सुनने की आशा संजो रखी हो?
यदि संत का संदेश सार्वभौमिक है, तो उसका मंच भी यथासंभव सार्वभौमिक होना चाहिए।
यदि राष्ट्र उत्थान की बात है, तो राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रतिनिधि कोई मंत्री नहीं, बल्कि वह सामान्य नागरिक है जो बिना किसी परिचय-पत्र के केवल श्रद्धा लेकर आता है।
क्या यह आयोजन उस साधारण श्रद्धालु को उतना ही स्थान देगा, जितना उसने विशिष्ट अतिथियों को दिया है?
और अंततः, इतिहास आयोजनों की भव्यता नहीं, उनकी पहुँच को याद रखता है। एक संत का सबसे बड़ा वैभव मंच पर बैठे विशिष्टजन नहीं, बल्कि वह जनसमुदाय होता है जो उनके शब्दों में अपना मार्ग खोज ले। यही कसौटी किसी भी आध्यात्मिक आयोजन की सबसे बड़ी सफलता भी है।
-कपिल सिंह चौहान । द वॉचमैन पोस्ट