कपिलसिंह चौहान
16 June, 2026
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यह देश में शायद पहली दफा है जब 'नीट' (NEET) केवल डॉक्टर बनने की प्रवेश परीक्षा नहीं रह गई है। यह किसी देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए चलाए जा रहे 'ऑपरेशन' जैसी लगने लगी है। बीते कुछ सालों में इस परीक्षा ने 'लीक' होने के जो नए कीर्तिमान रचे हैं, और सरकार की जिस तरह किरकिरी हुई है उसके बाद इस बार मध्य प्रदेश सरकार ने तैयारियों का जो 'वार रूम' तैयार किया है, उसे देखकर शायद देश के रक्षा विशेषज्ञ भी दांतों तले उंगली दबा लें।
स्ट्रॉन्ग रूम से गोल्ड चोरी हो जाए लेकिन मजाल है कि परीक्षा का कोई पर्चा लीक हो
चौकसी की ऐसी बिसात तो किसी बड़ी जंग में भी नहीं बिछाई गई होगी। वायुसेना के विमान आसमान से प्रश्नपत्रों की 'सप्लाई ड्रॉप' कर रहे हैं, सूबे के पाँच एयरपोर्ट पर पर्चे पहुँच गए हैं और बालाघाट के जंगलों में हेलिकॉप्टर से पर्चे भेजे जा रहे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है ताकि मेडिकल के छात्र चुपचाप एक कमरे में बैठकर अपनी किस्मत में रंग भर सकें। पर्चों को बैंकों के जिन 'स्ट्रॉन्ग रूम' में लॉक किया गया है, वहाँ से शायद देश का रिजर्व गोल्ड भले खिसक जाए, लेकिन मजाल है कि परीक्षा का कोई पन्ना बाहर झांक ले!
मुख्यमंत्री का निर्देश: 'अगर साधन न मिले तो अफसर अपनी गाड़ी से बच्चों को परीक्षा केंद्र छोड़ें
व्यवस्था की संवेदनशीलता और 'वीआईपी ट्रीटमेंट' का आलम यह है कि सूबे के इतिहास में पहली बार पुलिस और प्रशासन के बड़े-बड़े हाकिमों को 'कैब ड्राइवर' की भूमिका में आने का फरमान सुनाया गया है। मुख्यमंत्री का यह निर्देश कि 'अगर साधन न मिले तो अफसर अपनी गाड़ी से बच्चों को परीक्षा केंद्र छोड़ें', भारतीय नौकरशाही के इतिहास में किसी अजूबे से कम नहीं है। कल तक जिस हुटर और लाल-नीली बत्ती वाली गाड़ी को देखकर लोग रास्ता छोड़ देते थे, उसी चमचमाती गाड़ी की बैक-सीट पर बैठकर हमारा होने वाला ‘डॉक्टर’ शान से सेंटर तक जाएगा। जो पुलिस अफसर कल तक 'सिंघम' बने घूमते थे, वो अब छात्रों के 'सारथी' की भूमिका में नजर आएंगे।
बायोमैट्रिक और जैमर के इंतजाम
सरकार इस बात को लेकर भी किसी मुगालते में नहीं रहना चाहती कि परीक्षा हॉल के भीतर एक पत्ता भी बिना बायोमैट्रिक और जैमर की इजाजत के दाखिल हो सके। 30 जिलों के 283 केंद्रों पर जैमर लगाने और परीक्षा से ठीक एक दिन पहले उनका 'ट्रायल रन' करने की जो कवायद है, वह किसी मिसाइल टेस्ट से कम नहीं लगती। अगर जैमर्स ने उम्मीद के मुताबिक काम किया, तो परीक्षा केंद्र के भीतर बैठा छात्र अपनी बगल की बेंच पर बैठे साथी से तो क्या, शायद अपनी अंतरात्मा से भी संपर्क नहीं साध पाएगा।
लेकिन, इस पूरी किलेबंदी की सबसे दिलचस्प कड़ी है, वो '15 मिनट का अतिरिक्त समय'। जो परीक्षा पहले 3 घंटे में सिमट जाती थी, उसे अब सवा तीन घंटे का कर दिया गया है। जानकार अब माथापच्ची कर रहे हैं कि यह अतिरिक्त समय सवालों से जूझने के लिए दिया गया है, या फिर गेट पर होने वाली 'टू-लेयर चेकिंग', बायोमैट्रिक मशीन पर अंगूठा रगड़ने और जैमर के खौफनाक सन्नाटे से उपजी घबराहट को दूर करने का 'कूलिंग पीरियड' है?
परीक्षा या कोई साहसिक जानलेवा मुहिम
इसके अलावा, परीक्षा केंद्रों के बाहर जिस तरह टेंट, ओआरएस, ग्लूकोज, mobile टॉयलेट और डॉक्टरों की 'क्विक रिस्पॉन्स टीम' का बंदोबस्त किया गया है, उससे यही लगता है कि बच्चे परीक्षा देने नहीं, बल्कि थार के मरुस्थल को पार करने की किसी साहसिक और जानलेवा मुहिम पर निकले हैं।
इस 'मिशन नीट-2026' को भविष्य की तमाम परीक्षाओं के लिए एक 'SOP मॉडल' का तमगा दे दिया गया है। मतलब शायद यह कि अब सूबे में पटवारी से लेकर डिप्टी कलेक्टर तक की हर परीक्षा को इसी मिलिट्री-ग्रेड प्रोटोकॉल से गुजरना होगा। सरकार अपनी इस अभूतपूर्व मुस्तैदी के लिए पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इस पूरे तामझाम को देखकर एक बड़ा और चुभता हुआ सवाल जहन में कौंधता है।
काश! जितनी ऊर्जा, सुरक्षा बल और तकनीक इन 'लीक हो चुके सुराखों' को बंद करने में झोंकी जा रही है, उतनी ही ईमानदारी उस 'सिस्टम' के भीतर पैदा हो जाती जहाँ से पेपर की पहली प्रति छपकर बाहर आती है। अगर वो सिस्टम साफ होता, तो शायद देश के भावी डॉक्टरों को किसी सैनिक कैंप जैसी फीलिंग के बीच परीक्षा न देनी पड़ती। इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि एक अदद परीक्षा कराने के लिए देश को इतने बड़े 'सर्कस' की जरूरत क्यों पड़ रही है।