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राज्यसभा चुनाव में बड़ा यू-टर्न: 'मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज करना कानूनन गलत', दिल्ली में चुनाव आयोग के सामने सिंघवी की तीखी दलीलें, पलट सकती है बाजी, खेल अभी बाकी !

कपिलसिंह चौहान 10 June, 2026 राजनीति

मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट को लेकर मचे घमासान में आज दिल्ली से लेकर भोपाल तक एक बेहद नाटकीय मोड़ आ गया है। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को कांग्रेस की लीगल टीम ने पूरी तरह 'गैर-कानूनी' और 'हास्यास्पद' करार दिया है।

बुधवार को देश की राजधानी दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और देश के दिग्गज अधिवक्ताओं के एक हाई-प्रोफाइल प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात कर अपना कड़ा पक्ष रखा। इस मुलाकात के बाद देश के जाने-माने कानूनविद और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने मीडिया के सामने आकर रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले की धज्जियां उड़ा दीं। सिंघवी ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह फैसला वैसा ही है जैसे कोई गणित में लिख दे कि "2 + 2 = 7 होता है, 4 नहीं"।

सिंघवी की वो दलीलें, जिसस पलट सकती है पूरी कानूनी बाजी
अभिषेक मनु सिंघवी और वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा ने देश के चुनाव कानून (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33A) का हवाला देते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश की तकनीकी कमियों को उजागर किया:

  • संज्ञान (Cognizance) और नोटिस का अंतर: सिंघवी ने साफ किया कि हैदराबाद की मेट्रोपॉलिटन कोर्ट से मीनाक्षी नटराजन को जो नोटिस मिला था, वह सिर्फ एक 'प्री-कॉग्निजेंस नोटिस' (Pre-cognizance Notice) था। यानी कोर्ट ने अभी तक मामले का संज्ञान ही नहीं लिया है, बल्कि केवल यह पूछा था कि संज्ञान क्यों न लिया जाए? कानून की नजर में जब तक कोर्ट औपचारिक संज्ञान नहीं लेता, तब तक कोई आपराधिक मामला लंबित माना ही नहीं जाता।
  • क्या छुपाया गया?: चुनावी नियमों (फॉर्म 26) के तहत किसी भी उम्मीदवार के लिए केवल दो तरह के मामलों की घोषणा करना अनिवार्य है- पहला, जिनमें कोर्ट द्वारा आरोप तय (Charges Frame) हो चुके हों और 2 साल से अधिक की सजा हो, और दूसरा, जिनमें कोर्ट संज्ञान ले चुका हो। चूंकि हैदराबाद का मामला एक निजी शिकायत है और इसमें कोई संज्ञान नहीं हुआ, इसलिए इसे 'जानकारी छुपाना' कहना कानून का मजाक उड़ाना है।

"जब कोई केस कानूनी रूप से अस्तित्व में ही नहीं है, तो उसे हलफनामे में दिखाना कैसे अनिवार्य हो सकता है? यह निर्णय पूरी तरह से कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत और राजनीति से प्रेरित दिखाई देता है।"- अभिषेक मनु सिंघवी, वरिष्ठ अधिवक्ता व कांग्रेस नेता

क्या अब भी कांग्रेस के लिए कोई उम्मीद बची है?
पहले जहाँ लग रहा था कि कांग्रेस इस रेस से पूरी तरह बाहर हो चुकी है, आज के इस बड़े अपडेट के बाद कांग्रेस की उम्मीदें एक बार फिर जिंदा हो गई हैं पार्टी इस वक्त दो स्तरों पर रणनीति बना रही है:

1. चुनाव आयोग का 'विशेष अधिकार' (अनुच्छेद 324)
कांग्रेस डेलीगेशन ने चुनाव आयोग से मांग की है कि वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करे और रिटर्निंग ऑफिसर के इस 'गलत' आदेश को तुरंत निरस्त करे। सिंघवी ने आयोग को हरियाणा और गुजरात के पुराने मामलों की याद दिलाई, जहाँ चुनाव आयोग ने नीचे के अधिकारियों के गलत फैसलों को खुद पलटा था। चुनाव आयोग ने इस मामले पर त्वरित और गहन समीक्षा का आश्वासन दिया है।
2. सुप्रीम कोर्ट में आपातकालीन याचिका (Urgent Mentioning)
यदि अगले 24 से 48 घंटों में चुनाव आयोग से राहत नहीं मिलती है, तो सिंघवी और तन्खा की जोड़ी इस 'स्पष्ट कानूनी गलती' को आधार बनाकर सीधे सुप्रीम कोर्ट या मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अर्जेंट मेंशनिंग करेगी। कानून के जानकारों का मानना है कि यदि आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक हो, तो अदालतें असाधारण परिस्थितियों में चुनाव प्रक्रिया के बीच में भी अंतरिम रोक लगा सकती हैं।

आज शाम को या सकता है आयोग का फैसला
शुरुआती दौर में जो मामला कांग्रेस की 'प्रशासनिक और कानूनी लापरवाही' जैसा नजर आ रहा था, आज दिल्ली में सिंघवी की अकाट्य दलीलों के बाद वह पूरी तरह 'रिटर्निंग ऑफिसर की कानूनी चूक या जल्दबाजी' का मामला बनता दिख रहा है।

18 जून को होने वाली वोटिंग से पहले अब पूरी गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। यदि आयोग या अदालत से मीनाक्षी नटराजन को हरी झंडी मिलती है, तो मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव एक बार फिर बेहद दिलचस्प और कड़े मुकाबले में बदल जाएगा। खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, पल-पल बदलते इस घटनाक्रम पर हमारी नजर बनी हुई है। संभावना है कि चुनाव आयोग अगले कुछ घंटो में इस मामले का पटाक्षेप कर दे जिससे साफ़ होगा की मीनाक्षी नटराजन मैदान में बनी रहेगी या नहीं।

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