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नशे के विरुद्ध अभियान के रडार से बाहर हैं सड़कों पर 'चलते फिरते बार' और ढाबों पर टकराते जाम !

कपिलसिंह चौहान 18 August, 2025

जब अभियान का असर पोस्टर, बैनर और रिकॉर्ड बुक तक सीमित रह जाए, तो सवाल उठना लाजमी है

  • कपिल सिंह चौहान

वाह! मध्यप्रदेश पुलिस ने कमाल कर दिया – “नशे से दूरी है ज़रूरी” वाला अभियान सीधे वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया. 15 दिन तक बैनर उठाया, रैली निकाली, नारे लगाए – और देखिये, इतिहास रच दिया! पहली बात तो यह कि तमाम कमियों व और भी बेहतरी की गुंजाईश के बावजूद इस तरह के अभियान प्रासंगिक हैं और पुलिस को इन गतिविधियों में शामिल रहना चाहिए.  

...लेकिन असली सवाल यह है साहब कि, पोस्टर उठाने से वाकई नशा कम हुआ या पुलिस की पब्लिसिटी हुई ? अभियान के दौरान भी और उसके बाद अब भी नीमच की सड़कों पर "चलती फिरती बार" के नज़ारे आम हैं – स्कूटी से लेकर SUV तक, अधिकाँश वाहन  ‘मोबाइल बार’ बन चुके हैं. गली-नुक्कड़ पर बालिग-नाबालिग सब सुरा रस का आनंद लेते दिख जाते हैं, मगर पुलिस वालों की नज़र "रिकॉर्ड बुक" पर टिकी रहती है.

ढाबों की तो बात ही मत कीजिए – अभियान के तहत रेलियों में तख्तियां ले कर जागरूकता फेला रहे हर थाना प्रभारी या पुलिस अधिकारी के क्षेत्र में दर्जनों ढाबे ऐसे हैं जहां भोजनालय की आड़ में खुलेआम जाम टकराए जा रहे हैं...लेकिन किसी पुलिस अधिकारी ने ऐसे ढाबों पर कोई कारवाई करना उचित नहीं समझा. जिम्मेदार अधिकारियों की कर्तव्य परायणता के रडार से ये ढाबे बाहर रहते हैं. आखिर रैली में तख्ती पकड़ना कहीं ज्यादा आसान है बनिस्बत ढाबों पर छापा मार कारवाई के.

शहर के कुछ स्कूलों की यह हालत है कि वहाँ यदा-कदा ब्राउन शुगर और स्मैक मिलने के किस्से सामने आए हैं, मगर कभी प्रबंधन द्वारा पेरेंट्स को धमका कर तो कभी थाना परिसरों में ही मामले दबा दिए जाते हैं. वहां कारवाई के खिलाफ पुलिस का तर्क बड़ा भावुक करने वाला होता है – "बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होना चाहिए." यानी नशा बच्चों के शरीर में जाए, उनका भविष्य, जीवन और परिवार बर्बाद कर दे, चलेगा… बस किसी के चारित्रिक रिपोर्ट कार्ड पर दाग़ न आए.

जनाब, अभियान चलाना बुरी बात नहीं है – लेकिन जब अभियान का असर पोस्टर, बैनर और रिकॉर्ड बुक तक सीमित रह जाए, तो सवाल उठना लाजमी है. असलियत यह है कि पुलिस धरातल पर वही काम टाल देती है जिसमें मेहनत हो, ईमानदारी हो और जोखिम उठाना पड़े, ले देकर इनके पास जनता के लिए सिर्फ नारे बचते हैं.

‘सोशल पुलिसिंग’ पुलिस की कार्यशेली का हिस्सा हो यह अच्छी बात है लेकिन व्यावहारिक रूप से उच्छृंखल भीड़ के मन से कड़ी कानून-व्यवस्था, कानून के उल्लंघन पर कारवाई और दंड के भय का विलुप्त हो जाना उन्ही के भविष्य के लिए खतरनाक है जिन्हें नशे के दलदल से बचाने के लिए आप तख्तियां ले कर निकले थे. 

  • द वॉचमैन पोस्ट

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