पंकज मलिक
24 July, 2026
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देश, देश की जनता, समर्थक और विरोधी, सभी 2026 के इस मानसूनी मौसम में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं, जो सरकार की नीतियों के विरोध को लेकर ज़रूर शुरू हुआ, पर अंततः मोदी विरोध पर ही आकर अटक गया।
छात्रों के 'कॉकरोची' नेता अभिजीत दीपके, जिसे राजनीति का "क ख ग" भी नहीं पता, वह केवल सोशल मीडिया के चलते इस आंदोलन का मुख्य चेहरा बन बैठा। दीपके और उसकी टीम ने सोशल मीडिया पर जो प्रसिद्धि पाई, वह अकल्पनीय थी। न राजनीतिक समझ, न ही लीडरशिप का ज्ञान और न ही बोलने में परिपक्वता, उसके बावजूद विरोध के इस मंच ने सभी लोगों का ध्यान ज़रूर खींचा।
मुद्दा मामूली था, जो इससे पहले भी कई बार हो चुका था… "पेपर लीक"। पर इसने सरकार की मजबूत नींव में भी "लीकेज" तो पैदा कर ही दिया। न किया होता, तो मेरा आकलन है कि कभी न झुकने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देर रात वीडियो जारी कर अपना बयान न देते। वे मोदी, जो विपक्ष के बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शनों की अपने मौन से धज्जियाँ उड़ाते नहीं चूकते, वे इस प्रदर्शन के बाद अपना बयान जारी करने पर मजबूर हो ही गए। इसी बात से इस विरोध प्रदर्शन की सफलता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देर रात खुद अपना वीडियो जारी कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित और कठोर कार्रवाई के साथ कई त्वरित समाधान भी अपने संबोधन में दे दिए। इस वीडियो संदेश को आंदोलन के प्रति सरकार की गंभीरता के संकेत के रूप में देखा गया।
शुरुआत में मामूली सा लगने वाला प्रदर्शन कब प्रभावी हो गया, कोई समझ ही नहीं पाया। 'संसद मार्च' तक जब यह प्रदर्शन पहुँचा, तभी इसके प्रभावी होने का असर दिखने लगा। उससे पहले तक तो सब इसके मटियामेट होने का ही इंतज़ार कर रहे थे।
एकदम से सरकार जागी, वरिष्ठ मंत्री जागे, अस्पताल पहुँचकर सोनम वांगचुक को भरोसे में लिया और उनका अनशन समाप्त कराकर ही माने। पर अभी विरोधाभास है-जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है और 'Gen Z' टिके हैं इस्तीफे की मांग को लेकर। हालांकि उसका क्या हश्र होता है, वह भविष्य के गर्भ में है।
पर इस आंदोलन की भीड़ ने एक बात तो साफ़ कर दी कि 2029 के बाद भी अगले 15 सालों तक सत्ता का स्वप्न देखने वाले मोदी और उनकी भाजपा को अब आत्ममंथन करना होगा!
ऐसा लगता है कि स्कूलों के बच्चों से लेकर युवा वर्ग (जिसमें Gen Z भी आता है) की चहेती होने का दावा करने वाली भाजपा के सामने इस मुद्दे पर आत्ममंथन की चुनौती खड़ी हुई है। मेरे आकलन में इस आंदोलन ने 'मोदी ब्रांड' की अजेय छवि पर सवाल खड़े किए हैं।
"कॉकरोच" जैसे घृणित और भद्दे से नाम वाली पार्टी ने उसे गज़ब की पटखनी दी है। हालांकि अभी तक उसे चारों खाने चित्त होने का झटका तो नहीं लगा है, पर किसी गैर-राजनीतिक पार्टी ने उसे नेगोशिएशन करने और सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है, यह भी तो कम नहीं है?
मुद्दा चाहे कोई भी रहा हो, विरोध का यह स्तर केवल भाजपा ही नहीं, अपितु "मोदी ब्रांड नेम" की धज्जियाँ उड़ा चुका है। माना इस प्रदर्शन में अराजकता हावी हो गई थी, पर उसकी जिम्मेदारी किसकी मानी जाएगी? अभी तो लोकसभा-राज्यसभा की कार्यवाहियाँ भी हंगामों की भेंट चढ़ रही हैं, क्योंकि विपक्ष को भी लगे हाथ ताल मिलाने का मौका जो मिल गया है।
कुछ आलोचकों का आरोप रहा कि राष्ट्रीय मीडिया ने आंदोलन के कई पहलुओं को अपेक्षित प्रमुखता नहीं दी। वहीं उसके इतर सोशल मीडिया पर कई छोटे-मोटे मीडिया चैनलों ने "मोदी विरोध" की जो भद्दी तस्वीर दिखाई, वह उनकी लोकप्रियता कम होने का बड़ा संकेत मानी जा रही है।
अब बीजेपी के लिए और खुद मोदी के लिए भी यह सोचने की बात है कि जिस Gen Z और युवाओं के भरोसे सत्ता में लगातार काबिज होने का रोडमैप बनाया जा रहा है, उसके बिगड़ने के संकेत आना शुरू हो गए हैं। जिन युवाओं के वोटबैंक के भरोसे आगे 'विकसित भारत 2047' का स्वप्न देखा जा रहा है, वे खुद विरोध प्रदर्शनों की अगुआई कर रहे हैं -चाहे दिल्ली हो या मुंबई, बिहार हो या कोलकाता, वहाँ भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं। मतलब देश के कई हिस्सों से विरोध के स्वर सुनाई दिए।
हालांकि मेरा यह आलेख सत्ताधीशों और उनके समर्थकों को सही न लगे! पर उन्हें यह आइना ज़रूर दिखाएगा—उनके खुद के भविष्य के सपनों के चकनाचूर होने का। गुजारिश है उन सभी से, सत्ता के मद में "तानाशाह" न बनिए, आखिर में समय सबका ही आता है। अब यह सत्ताधारी पार्टी और उसके पुरोधाओं को सोचना है कि उनकी नीतियों में, उनके शासन करने में कहाँ सुधार की दरकार है ताकि बादशाहत हमेशा कायम रहे।
हालांकि बात अब बातचीत की टेबल तक आ चुकी है। "कॉकरोच जनता पार्टी" को कमतर समझने वाले सत्ताधीश अब सुनने को तैयार हैं। कुल मिलाकर उन्हें खुद अब समझ आ गया है कि खुद के ही मूल मंत्र "सबका साथ, सबका विकास" की मूल परिभाषा क्या है?
बिल्कुल, ज़रूर मिलिए और सुलझाइए सब कुछ.. स्वागत है आपका, यही उम्मीद भी है कि देशहित में सब अच्छा ही होगा और देश आगे भी बढ़ेगा। अंत में यही कहूँगा:
"कुछ रहे न रहे, बस देश रहना चाहिए।"
पंकज मलिक। द वॉचमैन पोस्ट