कपिलसिंह चौहान
24 July, 2026
अन्य
एक तरफ सड़कों पर अपने भविष्य के लिए लाठियाँ खाते और आक्रोश में नारे लगाते देश के 'जेन ज़ी' युवा, और दूसरी तरफ आधी रात को बिना किसी तामझाम या सहायक के कैमरे के सामने अकेला खड़ा एक प्रधानमंत्री... सेल्फी मोड पर वीडियो बनाते हुए प्रधानमंत्री के ज़हन में चल क्या रहा होगा! हमेशा बेहद परफेक्ट और प्रेजेंटेबल फ्रेम में रहने वाले देश के शीर्ष नेता को आखिर सुबह तक का इंतज़ार न कर वह वीडियो बनाने की जल्दी क्यों थी जिसकी न तो फ्रेमिंग अच्छी थी, न प्रॉपर लाइटिंग, न प्रॉपर डिस्टेंस… ! क्यों सुबह तक का इंतज़ार नहीं किया उन्होंने? वजह ! शायद पहली बार उन्हें देश के युवा ने भरपुर गाली दी है और पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी बेक फुट पर हैं ।
हमारे प्रधानमंत्री आहत हैं… हम सभी जानते हैं कि इस प्रदर्शन के दौरान वो अपशब्द और मीम्स, जो जाने-अनजाने प्रधानमंत्री मोदी के लिए बोले गए, इतने भद्दे शब्द उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद आज तक नहीं बोले गए।
हम सभी प्रधानमंत्री बनने से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री उन नरेंद्र मोदी को जानते हैं, जिन्हें मंचों से धाराप्रवाह बोलने के लिए किसी टेलीप्रॉम्प्टर की आवश्यकता नहीं होती थी। जिनके पास देश के तमाम मुद्दे थे, तमाम विषयों पर बोलने का आत्मविश्वास था और 56 इंच का सीना था।
मैं हमेशा अपने परिचितों के बीच कहता रहा कि इस 'मोदी ब्रांड' को यदि नुकसान पहुँचा, तो भाजपा कहीं भरभरा ना जाए। 2014 के कुछ पहले से और उसके बाद इस जुलाई तक लगातार 'मोदी ब्रांड' से बड़ा ब्रांड देश में कोई नहीं रहा… इस दौरान हर चुनाव, हर इवेंट, हर मुद्दा, यहाँ तक कि फिल्म भी वही हिट रही जिस पर मोदी का साया या जुड़ाव रहा।
चुनावों के नाम पर तो भाजपा समर्थकों द्वारा यहाँ तक कहा जाने लगा कि ‘गधे’ को भी चुनाव लड़ा दो तो मोदी की वजह से जिता देंगे... और बस, ऐसे ही कई ‘गधों’ की वजह से जेन ज़ी के इस आंदोलन में प्रधानमंत्री मोदी को गालियाँ खानी पड़ रही हैं...भाजपाई समर्थकों द्वारा ही घोषित इन ‘गधों’ ने प्रधानमंत्री मोदी नाम के ब्रांड से बहुत कुछ पाया, चुनावों में जीत हासिल की, लेकिन अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभाईं…
यदि मोदी स्वयं वैसे न भी हों, जैसा मोदी ब्रांड को मोदी ने प्रोजेक्ट किया, तो भी भाजपा को मोदी नाम का बहुत फायदा हुआ। लेकिन अफसोस इस बात का है कि इस ब्रांड से सत्ता की मलाई सूतने वालों ने अपनी कार्यशैली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वैसा सपोर्ट नहीं किया जैसा उन्हें करना चाहिए था। हर विधायक और सांसद अपने क्षेत्र में जारी भ्रष्टाचार, शोषण और अव्यवस्थाओं को नज़रअंदाज़ कर सिर्फ मोदी ब्रांड पर ही निर्भर हो गया... इसमें गलती मोदी सहित शीर्ष नेतृत्व की भी रही। शीर्ष नेतृत्व ने भी भाजपा वोटर की तरह अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों को शायद ‘गधा’ ही मान लिया... विधायकों और सांसदों की आवाज़ छीन ली गई... जो भी होगा ‘दिल्ली’ से तय होगा, वही दोहराया जाएगा जो ‘दिल्ली’ कहेगी और वही होगा जो ‘दिल्ली’ करेगी... और मोदी के ‘मन की बात’ के आगे किसी के मन की नहीं चलेगी...
मोदी ब्रांड की बैसाखियों के सहारे खड़े होने वाले विधायक और सांसद इस तरह मानसिक अपाहिज हुए कि उनका स्व-विवेक, तार्किकता और विज़न सब इसी ब्रांड के अधीन हो गया... इस वटवृक्षीय मोदी ब्रांड के तले भाजपा के कई जनप्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी छवि निरंकुश बना ली है… जब स्थानीय जनप्रतिनिधियों की अपनी कोई मजबूत छवि या निर्णय लेने की क्षमता नहीं बचती, तो जनता की स्थानीय समस्याओं की सुनवाई बंद हो जाती है।
आज पेपर लीक को लेकर जेन ज़ी के आंदोलन में भाजपा शासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार आदि से भी भरपूर समर्थन मिल रहा है... आप स्वयं सोचें कि इंदौर, मुंबई या पटना में कोई मोदी से क्यों नाराज़ होगा? अगर वे गाली दें तो अपनी प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री को दें… लेकिन यह गाली सिर्फ मोदी को नहीं, उन ‘गधों’ को दी जा रही है जो मोदी ब्रांड की छत्रछाया में फल-फूल रहे थे और जीत की गारंटी की खुमारी में जिन्होंने जनता को सिर्फ कॉकरोच समझ लिया था...
यह गुस्सा और साहस या कहें दुस्साहस सिर्फ नीट पेपर लीक की वजह से नहीं है, और भी पेपर लीक हैं, और भी लूप होल हैं, और भी अव्यवस्थाएं हैं जो बीते एक दशक में लोगों ने महसूस की लेकिन लेकिन कभी बोल नहीं पाए... यह आक्रोश उस रवैये के प्रति है जहाँ ‘मोदी ब्रांड’ की ठसक में कुछ भी कहने और करने की स्वच्छंदता के चलते जनप्रतिनिधियों और भाजपा के ‘नकली समर्थकों’ द्वारा जनता को सिर्फ ‘कॉकरोच’ समझ लिया गया।
कपिल सिंह चौहान। द वॉचमैन पोस्ट