शायरी की दुनिया का वह चमकता सितारा आज हमेशा के लिए अस्त हो गया, जिसने आधी सदी से भी ज़्यादा वक़्त तक अपनी आसान भाषा और धारदार शेरों से करोड़ों दिलों को रोशन किया। मशहूर शायर और पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। वे सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक उर्दू गज़ल का वह मोड़ थे जिसने शायरी को महफ़िलों और भारी-भरकम दरबारी शब्दों से निकाल कर आम आदमी की रोज़मर्रा की भाषा, उसके सीधे संवाद और उसकी ज़मीनी हकीकत से जोड़ दिया।
उनके जाने से अदब (साहित्य) की दुनिया में जो खालीपन आया है, उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। बद्र साहब का जाना हमारी साझी संस्कृति के एक सुनहरे दौर का अंत है।
मेरठ का वह दंगा: जिसने घर जलाया, पर एक बेबाक शायर को जन्म दिया
बशीर बद्र साहब के जीवन का सबसे दर्दनाक और उनके लेखन को पूरी तरह बदल देने वाला मोड़ साल 1987 के मेरठ दंगे थे। उस समय वे मेरठ विश्वविद्यालय में उर्दू विभागाध्यक्ष थे। नफ़रत की उस आग ने बद्र साहब का आलीशान मकान, उनकी बरसों की कमाई और सबसे बढ़कर उनके जीवन भर की तपस्या—यानी उनकी लिखी हुई हज़ारों अनमोल अप्रकाशित गज़लों और किताबों के कलेक्शन को जलाकर राख कर दिया।
इस तबाही के मलबे से जब बशीर बद्र बाहर निकले, तो उनका अंदाज़ बदल चुका था। उन्होंने नफ़रत फैलाने वालों को किसी हथियार से नहीं, बल्कि अपनी कलम की उस धार से जवाब दिया जिसने पूरी व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। उन्होंने लिखा:
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।"
और इसी त्रासदी से निकली उनकी यह बात आज भी लोगों के दिलों को झकझोर देती है:
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए।"
जब अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में उनके नाम के आगे 'बद्र' जोड़ा
बशीर बद्र साहब के जीवन का एक बेहद दिलचस्प पहलू उनके नाम से जुड़ा है। उनका असली नाम 'सैयद मोहम्मद बशीर' था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की थी।
कहा जाता है कि जब वे अलीगढ़ में पढ़ते थे, तब वहां 'बशीर' नाम के कई छात्र थे। भीड़ में अपनी एक अलग पहचान बनाने और शायरी के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने अपने नाम के आगे 'बद्र' (जिसका मतलब पूर्णिमा का चांद होता है) जोड़ लिया। बाद में अलीगढ़ के साहित्यिक माहौल ने उन्हें वह चमक दी कि वे सचमुच उर्दू शायरी के 'बद्र' बन गए।
शायरी का नया दौर: मुश्किल शब्दों को छोड़ आम जनता की चुनी जबान
बशीर बद्र से पहले की शायरी में बहुत मुश्किल और अरबी-फारसी के भारी शब्दों का इस्तेमाल होता था, जिसे समझने के लिए आम आदमी को डिक्शनरी देखनी पड़ती थी। बद्र साहब ने इस चलन को पूरी तरह से बदल दिया। उन्होंने अपनी गज़ल में 'गिलास', 'कागज़ की कश्ती', 'स्कूल की किताब', 'फ़ाइलें' और 'सड़क' जैसे आम बोलचाल के शब्दों को जगह दी।
वे अक्सर कहते थे:
"मैं आम आदमी के लिए लिखता हूँ, ताकि वह मेरे शेरों में अपनी थाली का दर्द और अपने फटे हुए जूतों की कहानी देख सके।"
उनकी इसी सादगी ने उन्हें दुनिया भर में बेहद लोकप्रिय बना दिया। उनके शेर जितने सरल थे, सत्ता और समाज के दोगलेपन पर उतनी ही करारी चोट करते थे:
"तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।"
जिंदगी का आखिरी दौर: अल्जाइमर की खामोशी और यादों का धुंधलका
जीवन के अंतिम वर्षों में बद्र साहब भोपाल में रहे, जहाँ उन्होंने एक बेहद कठिन दौर देखा। वे अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) के शिकार हो गए थे। यह कुदरत का सबसे बड़ा क्रूर मज़ाक था कि जिस शायर के शेरों को पूरी दुनिया जुबानी याद रखती थी, वह खुद अपनी ही लिखी बेहतरीन बातें भूल गया था। वे अक्सर चुपचाप खिड़की के बाहर देखते रहते। कभी-कभी जब रेडियो या टीवी पर उनका कोई शेर गूंजता, तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती, जैसे कोई बहुत पुराना भूला हुआ दोस्त याद आ गया हो। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने इस कठिन समय में परछाई की तरह उनका साथ दिया।
अमर कलाम: जो हमेशा याद किए जाएंगे
बशीर बद्र साहब भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनके लिखे ये शेर जब तक इंसानी जज्बात जिंदा हैं, तब तक गूंजते रहेंगे:
- बदलते समाज और इंसानी व्यवहार पर:
"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।"
- नेताओं और व्यवस्था की असलियत पर:
"सलामी देते हुए हाथ कट गए मेरे,
वो पूछना ही भूल गया कि काम क्या है तेरा।"
"हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।"
अंतिम विदाई
डॉ. बशीर बद्र का जाना सिर्फ एक शायर का जाना नहीं है, बल्कि देश की उस साझी संस्कृति के एक बड़े पहरेदार का उठ जाना है, जो नफ़रत के दौर में भी मोहब्बत की बात करने का हौसला रखता था। पूरी दुनिया इस महान कलाकार को हमेशा नम आँखों से याद रखेगी।