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मकर संक्रांति से पहले सूना आसमान, वीरान मैदान… कहाँ खो गई गिल्ली-डंडा और पतंगों वाली पीढ़ी?

तबरेज अगवान  12 January, 2026

नीमच। 14 जनवरी को आने वाली मकर संक्रांति कभी सिर्फ़ एक त्योहार नहीं होती थी, बल्कि पूरे शहर का उत्सव बन जाया करती थी। त्योहार से कई दिन पहले ही खेल मैदानों में गिल्ली-डंडा खेलने वालों का सैलाब उमड़ पड़ता था। घरों की छतों पर पतंगबाज़ जमा होते थे और आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता था।

लेकिन आज हालात इसके बिल्कुल उलट हैं।
अब न आसमान में पतंगों की होड़ दिखती है, न मैदानों में बच्चों की किलकारियां। मिडिल स्कूल ग्राउंड हो या गांधी भवन, तपोभूमि हो या क्रमांक 02 मैदान, दशहरा मैदान हो या स्टेडियम—जहां कभी मकर संक्रांति से पहले मेले जैसा माहौल रहता था, वहां आज सन्नाटा पसरा है। खुली जगहें तो हैं, लेकिन खेलने वाले हाथ गिनती के रह गए हैं।
महज पांच साल पहले ही नीमच में गिल्ली-डंडा सिर्फ़ खेल नहीं था, बल्कि दोस्ती, प्रतिस्पर्धा और हुनर का इम्तिहान हुआ करता था। पतंगबाज़ी में पूरे मोहल्ले की शान जुड़ी होती थी। कौन सबसे ऊँची पतंग उड़ाएगा, किसकी मांझा डोर सबसे तेज़ होगी—इसी में दिन निकल जाता था।

हालांकि वक्त के साथ तस्वीर बदल गई है। चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध, सुरक्षा को लेकर सख्ती, मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स की लत, बच्चों में मैदानी खेलों के प्रति घटती रुचि और बदलते शौक—इन सबने मिलकर त्योहार की रौनक को फीका कर दिया है। अब बच्चे मैदानों की बजाय स्क्रीन पर उंगलियां चला रहे हैं और छतें वीरान पड़ी हैं।
लोग मानते हैं कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी मकर संक्रांति को सिर्फ़ तारीख़ के रूप में जानेगी, अनुभव के रूप में नहीं। ज़रूरत है कि परंपरागत खेलों को फिर से बढ़ावा दिया जाए, सुरक्षित पतंगबाज़ी को प्रोत्साहित किया जाए और बच्चों को मोबाइल से बाहर निकालकर मैदान तक लाया जाए।
मकर संक्रांति सिर्फ़ सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। सवाल ये है—क्या हम इस विरासत को बचा पाएंगे या फिर पतंगों की तरह इसे भी यादों के आसमान में ही उड़ने देंगे?

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