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अरे सीना ठोककर बोलो ‘हमारा मुख्यमंत्री चोर नहीं’: CM की सुरक्षा को लेकर संवेदनशील सत्ता पक्ष को उनके सम्मान की रक्षा का भान क्यों नहीं ! - कपिल सिंह चौहान

कपिलसिंह चौहान 30 June, 2026 राजनीति

राजनीतिक शुचिता का अवसान और मौन की कूटनीति:

"मोहन यादव चोर हैं..." जब देश के एक बड़े राज्य के मुखिया के खिलाफ, सूबे की पुलिस की मौजूदगी में, सरेआम और सीधे नाम लेकर ये नारे गूंज रहे हों, तो यह केवल एक राजनीतिक दल का विरोध नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक मर्यादा के ढह चुके किले का सबूत है। भारतीय राजनीति में सारी शालीनता, संस्कार और सभ्यता आज सत्ता और विरोध की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। शब्दों ने अपनी सीमाएं लांघ दी हैं और सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन अमर्यादित शब्दों पर सत्ता पक्ष की 'मौन स्थाई स्वीकृति' धीरे-धीरे राजनीति में नए ‘संस्कार’ का रूप लेती जा रही है। wm

यह पूरा दृश्य हाल ही में नीमच में उस वक्त देखने को मिला जब एक तरफ विकास कार्यों के लोकार्पण और भूमि पूजन के कार्यक्रम में आए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सभा जारी थी, और दूसरी ओर कांग्रेस कार्यकर्ता नीमच जिलाध्यक्ष तरुण बाहेती के नेतृत्व में मुख्यमंत्री के खिलाफ सीधे तौर पर यह तीखी नारेबाजी कर रहे थे। wm
इस उग्र विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि अचानक तैयार नहीं हुई थी। दरअसल, कांग्रेस ने काले झंडे दिखाने की चेतावनी पहले ही दे दी थी। मुद्दा केवल स्थानीय समस्याओं का नहीं, बल्कि इसकी जड़ें दिल्ली और भोपाल के प्रशासनिक गलियारों से जुड़ी थीं।

'द इंडियन एक्सप्रेस' का खुलासा बना बहाना 
विपक्ष के इस स्तर के नैतिक साहस और आक्रामक रुख के पीछे प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट है। विदीत है कि इस रिपोर्ट में तथ्यों के साथ दावा किया गया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिवार ने मुख्यमंत्री बनने के बाद और उससे पहले उच्च शिक्षा मंत्री रहते हुए, उन चुनिंदा स्थानों पर असीम जमीनें खरीदीं जहाँ सरकार के बड़े विकास प्रोजेक्ट और प्रमुख सड़क परियोजनाएं प्रस्तावित थीं या आ चुकी थीं।  
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'हितों के टकराव' के इस गंभीर मुद्दे को लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी दिल्ली और भोपाल में दो बार बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं। यह मुद्दा कांग्रेस नहीं, बल्कि पूरी तरह से मीडिया (इंडियन एक्सप्रेस)  द्वारा उठाया गया था, जिसमें कांग्रेस की अपनी कोई भूमिका नहीं थी, लेकिन मुख्य विपक्षी दल ने इस बड़े खुलासे को हाथों-हाथ लपक लिया और सीधे मुख्यमंत्री के परिवार को कटघरे में खड़ा कर दिया।

जवाबदेही से बचती 'मौन की कूटनीति'
इस पूरे प्रकरण में सबसे विचारणीय पक्ष मुख्यमंत्री और सत्ता पक्ष की लंबी चुप्पी है। इतने दिन बीत जाने के बाद भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ओर से कोई आधिकारिक या व्यक्तिगत खंडन सामने नहीं आया है। मुख्यमंत्री के मौन के बीच, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मुख्यमंत्री और संगठन का पक्ष जरूर रखा, लेकिन उनके बयान में एक खास राजनीतिक चतुराई और रक्षात्मक रवैया दिखा।       
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खंडेलवाल ने कांग्रेस के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए तर्क दिया कि मुख्यमंत्री का परिवार कई वर्षों से रियल एस्टेट के कारोबार में है, इसलिए व्यावसायिक तौर पर जमीन का क्रय-विक्रय एक सामान्य बात है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री की 'इमीडिएट फैमिली' (पत्नी, पुत्र और बहू) की संपत्ति में कोई अप्रत्याशित बढ़ोतरी नहीं हुई है।

रणनीतिक परहेज !
गौरतलब है कि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने अपने पूरे बयान में द इंडियन एक्सप्रेस और  उसकी मूल रिपोर्ट या उसमें उठाए गए विशिष्ट तकनीकी सवालों का कोई जिक्र नहीं किया। उन्होंने केवल कांग्रेस द्वारा उठाए गए सवालों को ही अपना निशाना बनाया। भाजपा संगठन द इंडियन एक्सप्रेस का नाम लेने से भी बचता नजर आ रहा है। यहाँ तक कि इंडियन एक्सप्रेस हिन्दी के सौरभ द्विवेदी ने भी अपने एक विशेष एपिसोड में इस बात को पुनः रेखांकित किया कि आखिर क्यों इस अखबार द्वारा उठाए गए तीखे सवालों का सीधा जवाब देने से बचा जा रहा है।

इनके लिए व्यक्ति की सुरक्षा अहम लेकिन सम्मान की रक्षा कौन करेगा
जब नीमच के हेलीपैड पर इसी दौरे के दौरान भाजपा के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता अपने लाडले नेता मुख्यमंत्री यादव से न मिल पाने और बैरिकेड के पार न जाने देने की शिकायत जिला प्रभारी सुभाष पटेल से कर रहे थे। तब प्रभारी उन्हें समझाते हुए दिखे कि, "यह सुरक्षा घेरा इसलिए कड़ा रखा गया है ताकि भीड़ में कोई कार्यकर्ता या नेता मुख्यमंत्री से हाथ मिलाने के लिए उनका हाथ न पकड़ ले, या कहीं कोई उन्हें बुके न पकड़ा दे।"
यहाँ एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि संगठन और प्रशासन व्यक्ति के तौर पर मुख्यमंत्री की शारीरिक सुरक्षा Protocol को लेकर तो इतना संवेदनशील है, लेकिन जब कांग्रेस खेमा सरेआम पुलिस के सामने उनके नाम के साथ 'चोर' शब्द जोड़कर मान-मर्यादा पर सीधे कीचड़ उछाल रहा था, तब उनके सम्मान और गरिमा की रक्षा का भान संगठन और प्रशासन को क्यों नहीं है ? 
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स्थानीय नेतृत्व की निष्क्रियता और पुलिस का रवैया
अचरज की बात यह है कि प्रदेश के एक शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ‘चोर’ कह कर संबोधित किया गया, लेकिन घटना के २४ घंटे बाद भी नीमच पुलिस द्वारा कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई। पुलिस की कार्रवाई को यदि छोड़ भी दें, तो भाजपा के स्थानीय कैडर, मंच पर आसीन वरिष्ठ नेताओं या अपने नेता से मिलने को आतुर किसी भी कार्यकर्ता ने इस अभद्र नारेबाजी का मौके पर या उसके बाद कोई कड़ा प्रतिकार नहीं किया।

सीना ठोककर क्यों नहीं कहा कि ‘हमारा नेता चोर नहीं’
किसी भी स्थानीय नेता ने सीना ठोककर यह बयान जारी नहीं किया कि "हमारे मुख्यमंत्री निष्कलंक हैं और उन पर लगे आरोप झूठे हैं।" कोई भाजपाई इस मामले में रिपोर्ट लिखाने थाने नहीं गया और खुद मुख्यमंत्री ने भी इस पर अब तक कुछ नहीं कहा। यहाँ तक कि जब पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर ७० किलोमीटर दूर रतनगढ़ ले जा रही थी, तब भी पुलिस वैन के भीतर से मुख्यमंत्री के खिलाफ यही नारेबाजी जारी रही। कांग्रेस को यह नैतिक साहस भाजपा के इसी मौन रवैये से मिल रहा है।
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चौथे स्तंभ के प्रति जवाबदेही जरूरी
भारतीय राजनीति के इतिहास में प्रतीकात्मक रूप से "चौकीदार ही चोर है" जैसे नारे पहले जरूर गूंजे हैं, लेकिन किसी मुख्यमंत्री का सीधे नाम लेकर इस तरह की तीखी नारेबाजी अमूमन देखने को नहीं मिलती। भाजपा भले ही इसे कांग्रेस की राजनीति करार देकर नजरअंदाज करने का प्रयास करे और सोचे कि चुप रहकर वह जनता की नजरों में निर्दोष बनी रहेगी, लेकिन तथ्यों पर साधी गई यह चुप्पी लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।

राजनीतिक विरोधियों को जवाब देना भले ही जरूरी न हो, लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में सशक्त आवाज बुलंद करने वाले द इंडियन एक्सप्रेस के सवालों का जवाब दिया जाना भाजपा के लिए इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि यह मुद्दा अब आम जनता के विमर्श और उनके दिलों में घर करते  जा रहा है। जवाब न देकर सत्ता पक्ष और संगठन निर्दोष नहीं बल्कि बेशर्मी से अपनी जवाबदेही से भागता हुआ ही प्रतीत हो रहा है। 
कपिल सिंह चौहान | द वॉचमैन पोस्ट

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