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मिट्टी की पुकार सुनी, रसायन छोड़ा... अब खेत भी खुश, किसान भी

डेस्क न्यूज़ 26 June, 2026 अन्य

मनासा/नीमच। नीमच जिले के मनासा विकासखंड के छोटे से गांव फूलपुरा के किसान प्रकाश खूंवार ने यह साबित कर दिया है कि यदि किसान आधुनिक सोच के साथ प्राकृतिक खेती अपनाए तो कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकता है। कभी रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर हर साल हजारों रुपये खर्च करने वाले प्रकाश आज प्राकृतिक खेती के जरिए न केवल अपनी खेती की लागत में भारी कमी ला चुके हैं, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधारने में सफल हुए हैं।

कुछ वर्ष पहले तक प्रकाश खूंवार अपनी 10 बीघा कृषि भूमि पर डीएपी, यूरिया, सुपर फॉस्फेट, सल्फर और रासायनिक कीटनाशकों का व्यापक उपयोग करते थे। हर सीजन में लगभग 60 हजार रुपये केवल खाद और दवाइयों पर खर्च हो जाते थे। इसके बावजूद उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही थी। लगातार रसायनों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही थी और खेती का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा था।

करीब तीन वर्ष पहले प्रकाश खूंवार संस्था सॉलिडेरिडाड से जुड़े, जहां उन्हें पुनर्योजी (रीजेनरेटिव) कृषि का प्रशिक्षण मिला। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपनी खेती का तरीका पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने खेत में रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों का उपयोग लगभग बंद कर दिया तथा घर पर ही नीमास्त्र, घनजीवामृत और जीवामृत तैयार करना शुरू किया। इसके साथ ही उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट यूनिट भी स्थापित की, जिसमें नियमित रूप से जीवामृत मिलाकर कम्पोस्ट को नम रखा जाता है, ताकि लाभकारी सूक्ष्म जीव सक्रिय बने रहें और मिट्टी की जैविक गुणवत्ता लगातार बेहतर होती रहे।

प्राकृतिक खेती अपनाने का परिणाम बेहद उत्साहजनक रहा। जहां पहले खेती पर लगभग 60 हजार रुपये खर्च होते थे, वहीं अब उनकी लागत घटकर करीब 12 हजार रुपये रह गई है। यानी खेती की लागत में लगभग 80 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं उत्पादन में भी कोई कमी नहीं आई। वर्तमान में 4 से 5 बीघा भूमि से उन्हें 55 से 60 बोरी तक रसायनमुक्त गेहूं का उत्पादन प्राप्त हो रहा है। प्राकृतिक तरीके से तैयार गेहूं की बाजार में अच्छी मांग है और किसानों को बेहतर कीमत भी मिल रही है।

संस्था सॉलिडेरिडाड के महाप्रबंधक डॉ. सुरेश मोटवानी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खेती में रासायनिक निर्भरता कम करने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया है। इसी उद्देश्य से भारत-यूरोपीय संघ की साझेदारी के अंतर्गत संचालित कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को पुनर्योजी कृषि से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रकाश खूंवार जैसे किसान इस अभियान की प्रेरणादायक मिसाल बनकर अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

आज प्रकाश खूंवार केवल अपनी खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आसपास के किसानों को भी प्राकृतिक खेती के फायदे समझा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि किसान धीरे-धीरे रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करें, मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता दें और जैविक विकल्प अपनाएं, तो खेती अधिक लाभदायक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बन सकती है।

प्रकाश खूंवार का संदेश भी साफ है— "धीरे-धीरे रसायन छोड़िए, अपनी मिट्टी को पहचानिए। मिट्टी स्वस्थ होगी तो खेती अपने आप लाभ का सौदा बन जाएगी।

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