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हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं - ओमप्रकाश चौधरी

डेस्क न्यूज़ 13 June, 2026 अन्य

यह वाक्य आपने अक्सर सुना होगा, खासकर उनसे जो यह समझते हैं कि हमें बताये बिना पत्ता भी नहीं खड़कना चाहिए। प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी की रचनाओं पर बने धारावाहिक का एक पात्र अक्सर यह कहता है कि—"हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं।" ये वे लोग होते हैं जिनसे किसी भी बात के बारे में पूछा जाए या यह कहा जाए कि आप फलां जगह या कार्यक्रम में गये नहीं, तो इनका स्थाई उत्तर होता है—"हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं", जबकि इन्हें मालूम सब होता है। लेकिन अपनी बला दूसरों के सर डालने में माहिर ये लोग इस जुमले का सहारा ज़रूर लेते हैं। ऐसा करके ये जिम्मेदारियों से तो बच ही जाते हैं, बल्कि यह कहने से भी नहीं चूकते कि यदि हमें बताया होता तो फलां काम हो ही जाता। ऐसे लोग खुद को अति विशिष्ट व्यक्ति (VIP) समझते हैं और उन्हें लगता है कि चाहे जो हो, हमें हर बात बताई जानी चाहिए; चाहे उससे इनका सम्बन्ध हो या न हो। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो ये रायता फैलाने में देर नहीं करते। जैसे ही बात बिगड़ी, ये यह कहने से भी नहीं चूकते—"हमें बिना बताये फलां काम करने चले थे, अब भुगतो!" शायद ऐसे ही लोगों के लिए कबीर ने कहा है—'निंदक नियरे राखिये' और तुलसी भी पहले इन्हीं की वन्दना करते हैं। राम के राज्याभिषेक में बाधा पड़ने पर राजा दशरथ कैकेयी से कहते हैं कि मैंने तुम्हें बिना बताये यह निर्णय ले लिया, इसीलिए मेरा मनोरथ पूरा नहीं हुआ है।

परिवार में भी देख लीजिये; घर में सास या पत्नी या और कोई जो अपने को सर्वेसर्वा समझता है, यदि उन्हें किसी भी निमन्त्रण या महत्वपूर्ण बात के बारे में नहीं बताया जाए और यह सोचकर आप निश्चिन्त हो जाएँ कि परिवार के सबसे बड़े व्यक्ति को बता ही दिया है, तो जैसे ही अवसर आयेगा, सास या पत्नी से सुनने को मिल जाएगा—"आप ही जाइए, मुझे तो बुलाया ही नहीं या मुझे तो बताया ही नहीं है।" यदि बहू के परिवार में कोई कार्यक्रम हो और सासुजी को अलग से न बताया जाए, तो फिर देखिये आप सास के विशेषाधिकारों का प्रयोग! यही हाल तब भी होता है जब परिवार में केवल दो ही लोग पति-पत्नी ही हों, तब भी पत्नीजी का यह विशेषाधिकार है कि सब कुछ उन्हें बताया अवश्य जाय, वरना सुनने को तैयार रहिये—"मुझे तो किसी ने कुछ कहा ही नहीं, जिसे कहा है वो जाने।" बहू भले ही दूसरे शहर में रहती हो, यदि उसे मायके जाना है तो सास से पूछना और बताना ज़रूरी है, वरना सुनने को मिल सकता है—"सब अपनी मनमर्जी करते हैं, मुझे तो कोई बताता ही नहीं है।"

समाज हो या संस्थाएं, उनमें भी यह शिकायत आम है। सोशल मीडिया के इस ज़माने में कई बातों पर विचार-विमर्श मोबाइल पर ही करने का चलन बढ़ता जा रहा है। संस्था या समाज के समूह (Group) पर विषय विचार के लिए डाल कर कहा जाता है कि आप अपने विचार बताएं। अब विचार-विमर्श चलता रहता है और जब निर्णय लेने की बारी आती है, तो अचानक कुछ ऐसे लोग प्रकट हो जाते हैं कि—"ऐसा कैसे हो सकता है, हमें तो बताया ही नहीं या हमसे तो पूछा ही नहीं।" अब आप उन्हें लाख बताते रहिये कि फलां दिन आपने भी यह प्रस्ताव समूह में देख लिया था या आपको अलग से भी भेजा था, परन्तु 'मेरे मुर्गे की डेढ़ टांग' शैली में उनका जवाब होगा कि—"कुछ भी हो, हमसे बात करनी चाहिए थी।" अब आप गये थे समय बचाने या व्यापक विचार-विमर्श करने, परन्तु हो गया उल्टा। कभी-कभी सामने वाला इनसे ज्यादा भारी हो तो वह बहुमत का हवाला देकर निर्णय कर लेता है और ये अपना राग अलापते रह जाते हैं। काम तो हो गया, लेकिन जब भी अवसर आयेगा, ये यह कहने से नहीं चूकेंगे—"हमसे तो कहना चाहिए था, निर्णय करने का यह तरीका ठीक नहीं है।"

ऐसे लोगों की एक और फितरत होती है; आप इन्हें लाख बता दो कि यह बात है या फलां कार्यक्रम में आपको आना है, फिर भी यदि इन्हें टांग अड़ानी है या इन्हें नहीं आना है, तब भी इनका उत्तर तैयार होता है और वह भी ऐसा कि आप कुछ नहीं कर सकते। कई बार यह भी होता है कि ऐसे लोगों के न आने या अपनी राय न देने से सामने वाला बड़ी राहत महसूस करता है। यदि कोई उन्हें याद दिलाये कि फलां जी नहीं आये या उन्होंने तो कुछ कहा ही नहीं, तो बुलाने या बताने वाले का जवाब होता है—"अच्छा हुआ नहीं आये, बला टली; आते तो बात का बतंगड़ बनाते।" क्या करें साहब! ऐसे लोगों को बिना बताये रह भी नहीं सकते और बता दो या बुला लो, तो जब तक काम पूरा न हो जाए सांस अटकी रहती है। इनके साथ कुछ दूसरे भी होते हैं, जो खुद तो कुछ नहीं करते पर ऐसे 'सूचना प्रेमियों' को भड़काने में या उनकी हाँ में हाँ मिलाने में लगे ही रहते हैं।

पर ऐसा भी नहीं होता कि ऐसे लोग हमेशा ही सफल होते हैं। कभी-कभी इन 'सेर' को भी 'सवा सेर' मिल ही जाता है। कोई काम इन्हें बताये बिना हो जाए या ये किसी कार्यक्रम में ना जाएँ और अवसर आने पर खुद को न बताने का अपना दांव जैसे ही चलते हैं, इनसे भारी आदमी तुरंत जवाब देता है कि—"आप आ भी जाते तो क्या कर लेते? या क्या नया विचार बता देते? केवल अड़ंगा ही लगाते, अच्छा हुआ जो आपको बताया नहीं या आप आये नहीं।" तब ये बिचारे मन मसोस कर रह जाते हैं।

राजनीति में तो नेता इस अस्त्र का इस्तेमाल अक्सर करते रहते हैं। अचानक कुछ ऐसा घट जाए जिससे नेताजी या मंत्रीजी परेशान हो सकते हैं, तो इनका सीधा-सपाट जवाब होता है—"यह बात मेरी जानकारी में नहीं है, अब आपने बता दिया है तो वस्तुस्थिति पता करके इस पर कार्यवाही ज़रूर होगी।" "मुझे किसी ने कहा नहीं या मेरे संज्ञान में नहीं है"—यह कहकर जिम्मेदार नेता, मंत्री या अधिकारी पतली गली से निकल लेते हैं और थोड़े दिन में बात आई-गई हो जाती है।

वैसे "मुझे किसी ने कहा नहीं", यह वाक्य है बड़े काम की चीज़! यदि आप कोई काम करना या कहीं जाना भूल गये हों, तो यह कह कर बच सकते हो कि—"आपका निमन्त्रण आया तो होगा, पर मुझे किसी ने बताया नहीं।" कोई काम करना रह गया या आप करना नहीं चाहते, तो भी आप इस वाक्यांश का प्रयोग कर सकते हो; यानी अकर्मण्यता के मामले में यह वाक्यांश आपके लिए ढाल का काम करता है। बात बस इतनी सी है कि हर बुरी बात में भी कोई न कोई अच्छाई तो होती ही है, अब आप इसे किस तरह लेते हैं या प्रयोग करते हैं, यह आप पर निर्भर है। मैं भी इसीलिए बता रहा हूँ कि कहीं आप बाद में यह न कहो कि—"मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं!"

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