डेस्क न्यूज़
14 June, 2026
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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का फैसला सुनाते हुए कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएँ केवल “होममेकर” नहीं, बल्कि वास्तविक अर्थों में “राष्ट्र निर्माता” हैं। वाहन दुर्घटना मुआवजा से जुड़े एक मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी गृहिणी की मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि परिवार को मिलने वाली घरेलू देखभाल, प्रबंधन और श्रम की अपूरणीय क्षति भी होती है। इसी आधार पर न्यायालय ने मुआवजे की गणना के लिए गृहिणी के घरेलू श्रम का मूल्य न्यूनतम 30 हजार रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया है, जिसे प्रत्येक तीन वर्ष में 10 प्रतिशत बढ़ाया जाएगा।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 25 वर्ष पूर्व एक सड़क दुर्घटना में अपनी पत्नी को खो चुके व्यक्ति को 62 लाख 77 हजार रुपये का मुआवजा प्रदान किया। यह निर्णय भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वाहन दुर्घटना में किसी महिला की मृत्यु होने पर घरेलू देखभाल के नुकसान को एक अलग मद के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि अब तक गृहिणियों की मृत्यु के मामलों में मुआवजा तय करते समय उनकी आय का आकलन न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया जाता था। उन्हें कुशल अथवा अकुशल मजदूर की श्रेणी में रखकर उनके योगदान का मूल्यांकन किया जाता था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था को महिलाओं के योगदान का गंभीर अवमूल्यन बताया है। न्यायालय ने कहा कि सामान्यतः गृहिणी को परिवार के कमाऊ सदस्य पर निर्भर माना जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पूरे परिवार की व्यवस्था और संचालन काफी हद तक उसी पर निर्भर होता है।
न्यायालय ने लैंगिक समानता पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह का अर्थ किसी महिला को घरेलू नौकरानी समझना नहीं है। गृहिणी परिवार की आधारशिला होती है, जिसके श्रम, त्याग और समर्पण का आर्थिक मूल्य भले ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे, लेकिन उसका महत्व अत्यंत व्यापक होता है।
यह मामला हरियाणा में वर्ष 2001 में हुई एक सड़क दुर्घटना से संबंधित है, जिसमें एक महिला की मृत्यु हो गई थी। महिला के पति और तीन बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मुआवजे की मांग की थी। अधिकरण ने वर्ष 2003 में 2 लाख 42 हजार रुपये का मुआवजा मंजूर किया था। इससे असंतुष्ट परिवार पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ वर्ष 2024 में मुआवजा बढ़ाकर 8 लाख 43 हजार रुपये कर दिया गया तथा 7.5 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश भी दिया गया। इसके बाद दावेदार सर्वोच्च न्यायालय पहुँचे, जहाँ उन्हें न्याय की व्यापक व्याख्या के साथ यह ऐतिहासिक राहत मिली।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी निर्देश दिया है कि मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए। साथ ही उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को इन मामलों की निगरानी करने और चार वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों को प्राथमिकता से निपटाने के निर्देश दिए गए हैं।
निस्संदेह, सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। पहली बार न्यायालय ने गृहिणी की भूमिका को केवल घर तक सीमित न मानते हुए उसे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग स्वीकार किया है। यह फैसला न केवल महिलाओं के योगदान को उचित सम्मान देता है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि घरेलू कार्यों का महत्व किसी भी आर्थिक गतिविधि से कम नहीं है।
अब देश के सभी उच्च न्यायालयों और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों की जिम्मेदारी है कि वे इस ऐतिहासिक निर्णय को नजीर मानते हुए अपने फैसलों में लागू करें। तभी सर्वोच्च न्यायालय की इस संवेदनशील और प्रगतिशील सोच का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा तथा गृहिणियों को उनके योगदान के अनुरूप सम्मान और न्याय मिल सकेगा।