कपिलसिंह चौहान
27 April, 2026
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भारतीय फोटो पत्रकारिता के शिखर पुरुष रघु राय का जाना एक युग का अंत है। 83 वर्ष की आयु में, कैंसर से एक लंबी और साहसी लड़ाई के बाद दिल्ली में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। वे केवल एक फोटोग्राफर नहीं थे, बल्कि स्वतंत्र भारत के छह दशकों के उतार-चढ़ाव, उसकी गरीबी, वैभव, पीड़ा और शांति के सबसे बड़े गवाह थे।
शुरुआत: संगीत के जुनून से शटर की आवाज़ तक
1942 में जन्मे रघु राय का झुकाव शुरू में संगीत की ओर था, लेकिन किस्मत उन्हें सरकारी नौकरी के रास्ते होते हुए कैमरे के पास ले आई। उनके बड़े भाई, मशहूर फोटोग्राफर एस.पॉल ने उन्हें लेंस की दुनिया की ताकत दिखाई। 1965 में 'द स्टेट्समैन' से शुरू हुआ उनका सफर जल्द ही अंतरराष्ट्रीय फलक पर छा गया। 1977 में महान फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसों ने उन्हें 'मैग्नम फोटोज' के लिए चुना, जो दुनिया भर के फोटोग्राफरों के लिए किसी नोबेल पुरस्कार से कम नहीं है।
रघु राय का भारत: जहाँ तस्वीरें बोलती थीं
रघु राय का मानना था कि एक अच्छी तस्वीर वह है जो उस 'निर्णायक क्षण' को पकड़ ले, जहाँ समय ठहर जाता है। उनके काम को इस तरह से देखा जा सकता है-
मानवीय त्रासदी की आवाज़: 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के दौरान, मलबे और मिट्टी में दबे एक बच्चे की उनकी तस्वीर ने पूरी दुनिया का कलेजा चीर दिया था। वह तस्वीर आज भी कॉर्पोरेट लापरवाही और मानवीय दर्द का सबसे बड़ा वैश्विक प्रतीक है।
महापुरुषों का मानवीय चेहरा: उन्होंने इंदिरा गांधी की दृढ़ता, मदर टेरेसा की करुणा और दलाई लामा के भीतर की शांति को इतने करीब से कैद किया कि वे हस्तियाँ आम जनमानस के लिए और अधिक सजीव हो उठीं।
बनारस और गलियाँ: वे अक्सर कहते थे कि भारत की असली धड़कन उसकी गलियों और भीड़ में है। बनारस के घाटों पर उनकी तस्वीरें भीड़ और अकेलेपन के अद्भुत संगम को दर्शाती हैं।
एक योद्धा का अंतिम संघर्ष
रघु राय के भीतर का कलाकार आखिरी समय तक थका नहीं। कैंसर से जूझते हुए भी वे अपनी 57वीं किताब पर काम कर रहे थे। वे मानते थे कि उनका कैमरा ही उनका जीवन है। रविवार को उनका निधन हुआ, उसी शाम दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।
1972 में बांग्लादेश युद्ध के साहसी कवरेज के लिए उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उनके जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें "रचनात्मक दिग्गज" बताया, वहीं शशि थरूर ने उन्हें "अतुलनीय उस्ताद" कहा।
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी कहते हैं कि “वे तस्वीरों में कविता करते थे. तस्वीरों में पेंटिंग रचते थे. हर तस्वीर एक संसार साथ लेकर आती. उनकी स्याह-सफेद छवियों में जीवन के हज़ारों प्रकाश और रंग नुमायां थे।
आम जनमानस के लिए रघु राय का महत्व इसलिए है क्योंकि उन्होंने फोटो पत्रकारिता को अखबारों के पन्नों से निकालकर एक 'गंभीर कला' का दर्जा दिया। उन्होंने भारत की वास्तविकता को बिना किसी बनावट के, पूरी ईमानदारी के साथ दुनिया को दिखाया। उन्होंने नई पीढ़ी को सिखाया कि फोटोग्राफी केवल तकनीक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का खेल है। रघु राय भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी छोड़ी गई विरासत, हज़ारों की संख्या में वो ब्लैक-एंड-व्हाइट और रंगीन तस्वीरें आने वाली कई सदियों तक बदलते भारत की गवाह रहेंगी।
भारतीय फोटोग्राफी के उस महान 'महागुरु' को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।