डेस्क न्यूज
21 February, 2026
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नीमच। श्रमिकों के अधिकारों की गूंज अब देशव्यापी आंदोलन में बदलने जा रही है। भारतीय मजदूर संघ के 21वें अखिल भारतीय अधिवेशन में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों के बाद अब जिले से लेकर औद्योगिक प्रतिष्ठानों तक संघर्ष का बिगुल बजा दिया गया है।
6 से 8 तारीख तक पुरी में आयोजित अधिवेशन में देशभर से पहुंचे श्रमिक प्रतिनिधियों ने मजदूरों से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर गहन मंथन किया। विभिन्न विषयों पर प्रस्ताव रखे गए, जिन्हें सर्वसम्मति से पारित किया गया। अधिवेशन में श्रमिक हितों की रक्षा, लंबित मांगों के शीघ्र समाधान और श्रम नीतियों में आवश्यक सुधार पर जोर दिया गया।
अधिवेशन से पूर्व संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया से मुलाकात कर मांगों का ज्ञापन सौंपा था। मंत्री द्वारा जांच कर शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया गया, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से अधिवेशन में देशव्यापी आंदोलन का निर्णय लिया गया।
निर्णय के तहत जिला, तहसील, विकासखंड और औद्योगिक क्षेत्रों में धरना-प्रदर्शन व रैलियां आयोजित की जाएंगी। इसी क्रम में 25 फरवरी 2026 को दोपहर 1 बजे रैली निकालकर जिलाधीश के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया को ज्ञापन सौंपा जाएगा। ज्ञापन वाचन के दौरान श्रमिकों की समस्याओं और प्रमुख मांगों को विस्तार से रखा जाएगा।
आंदोलन की रणनीति तय करने के लिए गोमाबाई रोड स्थित एमपीईबी परिसर कार्यालय में बैठक आयोजित की गई, जिसमें संगठन के पदाधिकारियों ने आंदोलन को सफल बनाने की रूपरेखा तैयार की। बैठक में संगठन अध्यक्ष नितिन साहू, संस्थापक सदस्य पारस मल पटवा, जिला उपाध्यक्ष निर्दोष शर्मा, हरिकिशन चतुर्वेदी, पूर्व अध्यक्ष मनीष कुमार नागदा, कोषाध्यक्ष राजेश पोरवाल, सौरभ सिंह चौहान, संगठन मंत्री जगदीश बागड़ी, प्रदीप शर्मा, भरत लाल नागदा, प्रताप सिंह परिहार, राकेश कुमार बैरागी, मुकेश कारपेंटर, चंद्र सेठिया, जगदीश सोलंकी, शंभू प्रसाद शर्मा, आर.के. जैन, क्षेत्रीय सचिव प्रशांत कुशवाह सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे।
इसके साथ ही अखिल भारतीय वनवासी कृषि ग्रामीण मजदूर संघ के जिला अध्यक्ष चंद्रशेखर जायसवार, जिला सचिव मोहन यादव, राकेश बैरागी और मुकेश जोहरी सहित अन्य कार्यकर्ताओं की भी सक्रिय भागीदारी रही।
अब देखना यह होगा कि श्रमिकों की यह एकजुटता सरकार तक कितनी प्रभावी आवाज पहुंचाती है और लंबित मांगों पर कब तक ठोस निर्णय सामने आता है।