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पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के समर्थन में जयस की विशाल रैली, अडानी-अंबानी का पुतला दहन कर जताया आक्रोश

डेस्क न्यूज 25 December, 2025 अन्य

नीमच। देश के पारिस्थितिक-संवेदनशील एवं पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में हो रही जंगल कटाई, खनन और अवैध हस्तक्षेप के विरोध में आदिवासी संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के आह्वान पर गुरुवार को शबरी आश्रम से एक विशाल जनआंदोलन रैली निकाली गई। रैली मनासा नाका डाकबंगला, मेशी शोरूम, फव्वारा चौक, बारादरी, नया बाजार, घंटाघर, तिलक मार्ग और पुस्तक बाजार होते हुए 40 नंबर चौराहे पर पहुँची, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने अडानी-अंबानी का पुतला दहन कर अपना विरोध दर्ज कराया। इसके बाद जयस के प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर कार्यालय पहुँचकर राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन कलेक्टर के प्रतिनिधि को सौंपा।

रैली को संबोधित करते हुए जयस पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि वर्ष 2025 के दौरान अरावली पर्वतमाला, सिंगरौली कोल बेल्ट, छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य व बस्तर संभाग तथा तेलंगाना के कंचा गाचीबोवली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जंगल कटाई, खनन, निर्माण और भूमि डायवर्जन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पर्यावरणीय संतुलन और जैव-विविधता को गंभीर क्षति पहुँच रही है, वहीं आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों पर भी सीधा आघात हो रहा है।

जयस नेताओं ने कहा कि अरावली पर्वतमाला पश्चिमी भारत और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए जल पुनर्भरण और प्रदूषण नियंत्रण की प्राकृतिक ढाल है। सिंगरौली में प्रस्तावित कोयला खनन से लाखों पेड़ों की कटाई और वन्यजीव आवास के विखंडन का खतरा है। हसदेव अरण्य, जिसे मध्य भारत का फेफड़ा कहा जाता है, वहाँ वन भूमि डायवर्जन से हाथी गलियारों और लेमरू हाथी रिजर्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई। वहीं पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र बस्तर में ग्राम सभा की स्वतंत्र, पूर्व एवं सूचित सहमति के बिना खनन और सुरक्षा अवसंरचना विस्तार के आरोप लगाए गए। कंचा गाचीबोवली प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान को भी प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण बताया गया।

प्रदर्शनकारियों ने संविधान के अनुच्छेद 21, 48-क और 51-क (ह) का हवाला देते हुए कहा कि स्वच्छ पर्यावरण में जीवन के अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी कर खनन और वन कटाई को वैधता दी जा रही है। साथ ही पेसा अधिनियम 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 और वन संरक्षण अधिनियम 1980 के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया।

ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति से मांग की गई कि अरावली पर्वतमाला में सभी प्रकार के उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए तथा सिंगरौली, हसदेव, बस्तर और तेलंगाना जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ग्राम सभा की वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण किए बिना दी गई सभी स्वीकृतियों पर तत्काल रोक या कठोर संवैधानिक पुनरीक्षण किया जाए। जयस ने चेतावनी दी कि यदि पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित नहीं हुई तो आंदोलन को और अधिक तेज किया जाएगा।

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