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EXCLUSIVE: जलती चिता बन गयी बसें: जैसलमेर-हैदराबाद जैसे हादसों से मप्र को सबक लेने की ज़रूरत -सरकार तुरंत दे सभी बसों की सुरक्षा जांच के आदेश

डेस्क न्यूज 24 October, 2025


भोपाल/नीमच (द वॉचमैन पोस्ट) देशभर में लगातार बस दुर्घटनाओं में यात्रियों के जिंदा जलने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल में शुक्रवार तड़के हुए भीषण हादसे में 20 यात्रियों की मौत और इससे 10 दिन पहले राजस्थान के जैसलमेर में 22 यात्रियों के जिंदा जल जाने की घटना ने यात्री सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन दोनों घटनाओं से सबक लेते हुए मध्यप्रदेश सरकार को भी अब सख्त कदम उठाने होंगे ताकि राज्य में ऐसी त्रासदी न हो।

यूँ होते हैं लापरवाही और हादसे
राजस्थान की घटना में बताया जा रहा है कि हादसे वाली बस को नॉर्मल से AC में मॉडिफाई करवाया गया था और इसी सेंट्रल AC में शॉर्ट सर्किट हादसे का कारण बना. इसके बाद आग लगने से गेट बंद हो गया और लोग अंदर ही अटक गए और आग लगने से जिंदा जल गए. इसके बाद कुछ लोगों को कांच तोड़कर बचाया गया.

अगर स्लीपर बसों की बात करें तो सबसे पहले बस का Chassis खरीदा जाता है, इसके बाद उन पर बॉडी का काम होता है. बॉडी बनाने के लिए कई नियमों का पालन करना होता है, जिसमें बस में लगने वाली सीटों की संख्या, बस की साइज आदि अहम है. इसके बाद Chassis के हिसाब से बॉडी का निर्माण होता है.

इसके बाद तीन जांच एजेंसियों से अप्रूवल लेना होता है, जिसमें यह तय होता है कि किस तरह की बस बनाई गई है. इसके बाद बस को फिटनेस आदि सर्टिफिकेट मिलते हैं. बस बनाने वाले बॉडी मेकर को ये सर्टिफिकेट लेना होता है. फिर बॉडी की जांच होती है और सर्टिफिकेट जारी होता है. इसके बाद बस सड़क पर चलने के लिए तैयार होती है.

यह कारस्तानी पड़ती है भारी ?
दरअसल, जो बड़े बॉडी मेकर हैं, वो समय पर सारे अप्रूवल ले लेते हैं, जो थोड़ा बड़ा और महंगा प्रोसेस है. ऐसे में जो बस वाले छोटे बॉडी मेकर से बस बनवाते हैं तो वे कागजों में बस की साइज, सीटों की संख्या कुछ और दिखाते हैं और हकीकत में बस की डिजाइन कुछ और होती है. आम तौर पर 13 मीटर बस की साइज का अप्रूवल आता है और फिर उसे 15 मीटर तक डिजाइन कर देते हैं. जैसे डबल एक्सल की साइज वाली बस को सिंगल एक्सल चेसिस में बना देते हैं. इस दौरान कई बसों में फायर एग्जिट जैसी व्यवस्था भी करनी होती है.

सरकार तुरंत दे जांच के आदेश
युं तो प्रदेश में कुम्भकरणी नींद सो रहे परिवहन विभाग की हालत ऐसी है की यहाँ बगैर परमिट, बगैर बीमा के बसें सड़कों पर दौड़ रही हैं, ऐसे कुछ उदाहरण हाल ही में सामने आए हैं। शासन को परिवहन विभाग के जरिये राज्यभर में संचालित सभी बसों की तत्काल सुरक्षा जांच के आदेश देना चाहिये । प्रत्येक बस में इमरजेंसी गेट, फायर सेफ्टी इक्विपमेंट, और इमरजेंसी हैंडलिंग ट्रेनिंग की अनिवार्यता सुनिश्चित की जानी चाहिये ।

अधिकारियों पर सीधे हो कार्रवाई
कई जिलों के RTO कार्यालयों में पासिंग और फिटनेस प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएँ पाई गई  हैं। कई बसें सीमित सीटों में पास करवाई जा रही हैं, जिनमें स्लीपर की दूरी और सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होता। अब ऐसे किसी भी वाहन को फिटनेस सर्टिफिकेट देने वाले अधिकारियों पर सीधे कार्रवाई की जानी चाहिये ।यहाँ तो बगैर वाहन को देखे ही सिर्फ कागजों पर ही सर्टिफिकेट बना दिये जाते हैं।    

हर RTO को सख्त निर्देश हों कि यदि किसी भी बस में इमरजेंसी गेट बंद पाया गया या सेफ्टी नियमों का उल्लंघन हुआ, तो बस मालिक और पासिंग अधिकारी, दोनों पर कार्रवाई हो। दोषी RTO अधिकारियों को तत्काल निलंबित किया जाए।
इसके साथ ही सभी जिलों में 48 घंटे के भीतर एक स्पेशल ड्राइव चलाने के आदेश दिए जाएँ, जिसमें निजी और सरकारी बसों की तकनीकी जांच की जाये । बसों में फाइबर बॉडी, बंद खिड़कियां और कमजोर वायरिंग पर भी प्रतिबंध लगाया जाये ।

जनता भी जागरुक हो
जनता को भी जागरुक होना होगा और जैसे ही किसी बस में सुरक्षा मानकों की कमी दिखाई दे तो उसकी सूचना तुरंत सीएम हेल्पलाइन या 112 नंबर पर दें।
सरकार सुनिश्चित करे कि मध्यप्रदेश में एक भी बस हादसा अब लापरवाही के कारण नहीं होना चाहिए। सुरक्षा से समझौता करने वालों पर अब न सिर्फ जुर्माना बल्कि आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिये ।

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