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एमपी में फिर लौटेंगे 'बैरियर': सरकार का 'गुजरात मॉडल' पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने दिए 30 दिन में चेक पोस्ट शुरू करने के आदेश

द वाॅचमेन पोस्ट 22 April, 2026 प्रशासनिक

जबलपुर/नीमच: मध्य प्रदेश की सीमाओं पर बंद किए गए परिवहन चेक पोस्ट एक बार फिर आबाद होंगे। जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए सभी अंतर्राज्यीय चेक पोस्टों को 30 दिनों के भीतर फिर से स्थापित करने का आदेश दिया है। यह आदेश न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर रहा है, बल्कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के उस महत्वाकांक्षी फैसले पर भी सवाल उठा रहा है, जिसे 'सुशासन' का बड़ा कदम बताया गया था।

क्या था मुख्यमंत्री का 'गुजरात मॉडल' और क्यों बंद हुए थे चेक पोस्ट?
जुलाई 2024 में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य की सभी 45 परिवहन चेक पोस्टों को बंद करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। उस वक्त मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने तर्क दिए थे कि चेक पोस्टों पर अवैध वसूली और रिश्वतखोरी की शिकायतों के चलते चेक पोस्ट बंद करने का निर्णय सरकार ने लिया था। 
सरकार ने गुजरात की तर्ज पर 'रोड सेफ्टी एंड इंफोर्समेंट चेकिंग पॉइंट' और 'उड़न दस्तों' (Flying Squads) की व्यवस्था लागू करने की बात कही थी।
ट्रक ऑपरेटरों और ट्रांसपोर्टर्स की लंबी मांग को पूरा करते हुए माल ढुलाई को बाधा रहित (Barrier-free) बनाने का तर्क दिया गया था। साथ ही सरकार का मानना था कि पारदर्शी व्यवस्था से परिवहन विभाग के राजस्व में इजाफा होगा और जनता को कम परिवहन लागत का लाभ मिलेगा।

कोर्ट का ताजा आदेश 
हाईकोर्ट में दायर अवमानना याचिका के दौरान यह सामने आया कि सरकार का यह फैसला कानूनन "पुराने आश्वासनों" का उल्लंघन था। आदेश के विश्लेषण से मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
पुराना वादा बना गले की हड्डी: साल 2006 से लंबित एक जनहित याचिका में सरकार ने खुद शपथपत्र देकर कहा था कि ओवरलोडिंग रोकने के लिए चेक पोस्ट का सतत संचालन किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जब मामला अदालत में लंबित था और सरकार ने सुरक्षा का भरोसा दिया था, तो वह अचानक अपने वादे से पीछे नहीं हट सकती।
ओवरलोडिंग और सड़क सुरक्षा: कोर्ट का मानना है कि चेक पोस्ट बंद होने से ओवरलोडिंग पर नियंत्रण खत्म हो गया है, जिससे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है।
अदालत की अवमानना: हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि न्यायालय के समक्ष दिए गए आश्वासन का पालन न करना 'घोर अवमानना' है।

अब आगे क्या?
न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि 30 दिनों के भीतर सभी चेक पोस्ट फिर से लगाए जाएं।
सरकार के लिए चुनौती है कि अब सरकार को अपनी पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था और भौतिक चेक पोस्ट के बीच तालमेल बिठाना होगा। साथ ही नई व्यवस्था के बाद ट्रांसपोर्टर्स की चिंता भी बढ़ जायेगी, क्योंकि जो ट्रांसपोर्टर्स जुलाई 2024 में जश्न मना रहे थे, उनके लिए एक बार फिर पुरानी व्यवस्था में लौटना चिंता का विषय हो सकता है। ट्रांसपोर्टस को आशंका है कि चेक पोस्ट संचालन शुरू होने की दशा में एक बार फिर ‘सिस्टम’ को इन चेक पोस्ट के माध्यम से अवैध वसूली करने का हथियार मिल जाएगा।      

जहाँ सरकार ने भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर चेक पोस्ट हटाए थे, वहीं न्यायपालिका ने 'सड़क सुरक्षा' और 'न्यायिक आश्वासन' को सर्वोपरि माना है। अब देखना होगा कि मोहन यादव सरकार माननीय न्यायालय के आदेश को मानते हुए इन चेक पोस्ट को पुनः संचालित करने के साथ ही ‘अवैध वसूली’ को रोकने में भी सफल होगी या नहीं, या इस कानूनी पेंच से निकलने के लिए अपील करने का रास्ता अपनाएगी ?

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