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भोपाल की 'ग्रीन राइड' पर ब्रेक: 9 साल में 223 टन कार्बन बचाने वाली स्मार्ट साइकिलें अब कबाड़ में

डेस्क न्यूज़ 18 July, 2026 अन्य

भोपाल। राजधानी को प्रदूषण मुक्त बनाने और ग्रीन ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में शुरू की गई पब्लिक बाइक शेयरिंग (PBS) योजना आज बदहाली का शिकार हो गई है। कभी पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बनी यह परियोजना अब प्रशासनिक अनदेखी और नए ऑपरेटर की नियुक्ति में देरी के कारण पूरी तरह ठप पड़ी है। करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी गई स्मार्ट साइकिलें आईएसबीटी स्थित स्टोर में धूल खा रही हैं, जबकि उनके लिए बनाए गए विशेष साइकिल ट्रैक भी जर्जर हो चुके हैं।

9 साल में बचाया 223 टन कार्बन उत्सर्जन

25 जून 2017 को शुरू हुई इस योजना के तहत लोगों को कम दूरी के लिए पर्यावरण अनुकूल परिवहन का विकल्प उपलब्ध कराया गया था। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इन स्मार्ट साइकिलों से पिछले 9 वर्षों में 2.23 लाख किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की गई, जिससे लगभग 223 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका गया। यह उपलब्धि हजारों पेड़ लगाने के बराबर मानी गई थी।

5.36 करोड़ की 500 स्मार्ट साइकिलें अब बेकार

इस परियोजना पर करीब 5.36 करोड़ रुपये खर्च कर 500 स्मार्ट साइकिलें खरीदी गई थीं। इनके संचालन के लिए शहर में 55 डॉकिंग स्टेशन बनाए गए और होशंगाबाद रोड सहित प्रमुख मार्गों पर विशेष साइकिल ट्रैक विकसित किए गए। लेकिन रखरखाव के अभाव में अब ट्रैक उखड़ चुके हैं और साइकिलें लंबे समय से उपयोग से बाहर हैं।

एग्रीमेंट खत्म, नई व्यवस्था का इंतजार

योजना के संचालन की जिम्मेदारी संभाल रही चार्टर्ड बाइक कंपनी का अनुबंध 10 नवंबर 2025 को समाप्त हो गया। अनुबंध खत्म होने के बाद कंपनी ने सभी साइकिलें और डॉकिंग स्टेशन स्मार्ट सिटी प्रशासन को सौंप दिए। पिछले छह महीनों से नया ऑपरेटर नियुक्त नहीं होने के कारण पूरी व्यवस्था बंद पड़ी है।

छात्रों और नौकरीपेशा लोगों की बढ़ी परेशानी

इस सेवा के बंद होने का सबसे अधिक असर छात्रों और रोजाना कार्यालय आने-जाने वाले लोगों पर पड़ा है। पहले कम खर्च में सफर करने वाले लोग अब ऑटो या अन्य साधनों पर निर्भर हो गए हैं, जिससे उनका मासिक खर्च बढ़ गया है। कई लोगों ने इस योजना को दोबारा शुरू करने की मांग की है।

सरकारी धन और ग्रीन विजन पर सवाल

स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस परियोजना की विफलता पर सवाल उठाते हुए इसे सरकारी धन की बर्बादी बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते नया ऑपरेटर नियुक्त कर योजना को दोबारा शुरू किया जाए, तो यह न केवल ट्रैफिक और प्रदूषण कम करने में मददगार होगी बल्कि शहर में साइकिल संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को नया जीवन कब मिलेगा, या फिर यह हमेशा के लिए कबाड़ बनकर रह जाएगी।

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