पंकज मलिक
17 December, 2025
प्रशासनिक
प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था और संवेदनाओं के बीच संतुलन की परीक्षा
नीमच। (पंकज मलिक) नीमच जिला बीते दो महीनों से लगातार चक्काजाम की घटनाओं का गवाह बन रहा है। सड़क हादसा हो, अस्पताल में मौत, फैक्ट्री दुर्घटना या करंट से जान जाना—लगभग हर गंभीर घटना के बाद आक्रोश सड़कों पर उतर आता है। नतीजा यह कि पिछले दो महीनों में आठ बार प्रमुख मार्गों पर चक्काजाम लगा और जिले की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। इन प्रदर्शनों का सीधा असर उन आम नागरिकों पर पड़ता है, जिनका इन घटनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। स्कूल जाने वाले बच्चे, नौकरीपेशा लोग, एंबुलेंस, बुजुर्ग और जरूरी सेवाओं से जुड़े वाहन घंटों जाम में फंसे रहते हैं।
हर घटना के बाद एक ही तस्वीर
हर चक्काजाम के बाद प्रशासन और पुलिस का पूरा अमला मौके पर पहुंचता है। सड़क खुलवाने, भीड़ को समझाने और हालात संभालने में घंटों लग जाते हैं। संवेदनशील मामलों में पुलिस सख्ती नहीं दिखा पाती, क्योंकि मृतक के परिजन भी धरने पर बैठे होते हैं और जरा सी चूक हालात को विस्फोटक बना सकती है।
आम जनता भुगत रही “बिना गलती की सजा”
बार-बार लगने वाले चक्काजाम अब जिले की आम जिंदगी पर भारी पड़ने लगे हैं। कई लोगों की नौकरी छूट जाती है, परीक्षाएं और जरूरी काम प्रभावित होते हैं, मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते, इसके बावजूद विरोध का सबसे आसान तरीका अब सड़क जाम बनता जा रहा है।
राजनीति की एंट्री, आक्रोश का इस्तेमाल
कई मामलों में चक्काजाम के दौरान राजनीतिक दलों और नेताओं की मौजूदगी भी देखने को मिली। जनाक्रोश को हवा देने और अपने-अपने हित साधने की कोशिशों ने हालात और उलझा दिए। इस भीड़-तंत्र में आम आदमी की परेशानी कहीं दबकर रह जाती है।
दो माह में आठ चक्काजाम: एक नजर
17 अक्टूबर – ग्रीनको कंपनी के मजदूर की सड़क दुर्घटना में मौत, बस जलाकर स्टेट हाईवे जाम
3 नवंबर – मोरवन फैक्ट्री भूमि अधिग्रहण विरोध, सिंगोली-कोटा रोड बंद
8 नवंबर – एएसआई की गाड़ी से शिक्षक की मौत, फोरलेन घंटों बंद
17 नवंबर – कारूलाल सेन की मौत, मनासा-नीमच रोड जाम
23 नवंबर – जिला अस्पताल में महिला की मौत, तोड़फोड़ व चक्काजाम
25 नवंबर – डंपर हादसे में आदिवासी युवक की मौत, कोटा-सिंगोली मार्ग बंद
15 दिसंबर – मोकड़ी गांव में करंट से मौत, स्टेट हाईवे जाम
प्रशासन की मजबूरी और दुविधा
एसपी अंकित जायसवाल का कहना है कि ऐसे मामलों में पुलिस का सीधा रोल सीमित होता है। संवेदनशीलता और मानवीय पहलू को देखते हुए बल प्रयोग से बचते हुए बातचीत और समझाईश का रास्ता अपनाया जाता है।
वहीं कलेक्टर हिमांशु चंद्रा ने साफ शब्दों में कहा कि चक्काजाम से आम जनता को नुकसान होता है, खासकर एंबुलेंस, बुजुर्ग, बच्चे और जरूरी सेवाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। उन्होंने संकेत दिए कि अब ऐसे मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
राजस्थान का सख्त कानून, मध्यप्रदेश में भी जरूरत
पड़ोसी राज्य राजस्थान में हाल ही में राजस्थान मृत शरीर सम्मान अधिनियम लागू किया गया है। इसके तहत शव को सड़क पर रखकर प्रदर्शन करना अपराध है और इसमें 5 साल तक की जेल व जुर्माने का प्रावधान है। यह कानून 24 घंटे में अंतिम संस्कार अनिवार्य करता है। मृतक के गरिमामय अंतिम संस्कार के लिए भी यह आवश्यक है। साथ ही न केवल सख्त बल्कि मानवीय भी माना जा रहा है। विशेषज्ञों और प्रशासनिक हलकों का मानना है कि मध्यप्रदेश में भी ऐसे कानून की सख्त जरूरत है, ताकि संवेदना के नाम पर आम जनता को बंधक न बनाया जाए।
बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या हर दुख और हर मांग का समाधान चक्काजाम ही है? क्या न्याय पाने का रास्ता आम नागरिकों को परेशान करने से होकर जाता है?
नीमच में बढ़ती चक्काजाम की घटनाएं यह साफ संकेत दे रही हैं कि अब प्रशासन, समाज और जनप्रतिनिधियों—तीनों को मिलकर ऐसा संतुलित रास्ता निकालना होगा, जहां पीड़ितों को न्याय मिले और आम जनता को बार-बार सड़कों पर जाम की सजा न भुगतनी पड़े।