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विधानसभा चुनाव के सबक - ओमप्रकाश चौधरी

ओमप्रकाश चौधरी 08 May, 2026 राजनीति

​पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का एक और दौर खत्म हो गया, जहाँ बीजेपी ने असम और पुद्दुचेरी में सत्ता में वापसी कर ली। बंगाल में जीत का इतिहास रच दिया, केरल में तीन सीटों से अपना खाता खोल लिया; वहीं तमिलनाडु में गठबंधन के चक्कर में तेलंगाना जैसी गलती दोहराकर, अपने दम पर चुनाव जीतने के अन्नामलाई के सपने को तोड़कर रख दिया। ममता बनर्जी की तानाशाही और जंगलराज ने उन्हें दो अंकों में समेट दिया, यही नहीं वे खुद चुनाव हार गईं। फिर भी वे अपनी हार मानने को तैयार नहीं हैं और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली मुख्यमंत्री बन गयीं जो हारकर भी गद्दी न छोड़ने की जिद किये बैठी हैं। नयी विधानसभा का गठन होते ही "बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले" की तर्ज पर उनकी सत्ता से औपचारिक छुट्टी हो जायेगी। केरलम की जनता ने पांच साल पहले की गई अपनी गलती सुधारते हुए वामपंथियों से सत्ता की अंतिम कुर्सी भी छीन ली। कांग्रेस खुश हो सकती है कि उसे बैसाखियों के सहारे एक राज्य में और सत्ता मिल गयी। तमिलनाडु की जनता ने द्रविड़ राजनीति से आजिज आकर उसका अंत कर दिया, यही नहीं सनातन विरोधी स्टालिन को विधायक भी नहीं बनने दिया। सत्ता के अहंकार में 'इंडी गठबंधन' को बंगाल में न घुसने देने वाली ममता दीदी को हारने के बाद अब इंडी गठबंधन याद आ रहा है। उधर तमिलनाडु में डीएमके के हारते ही कांग्रेस ने उससे किनारा कर विजयन को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। अब तमिलनाडु में इंडी गठबंधन का आगे क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
​2014 से पहले तक देश की राजनीति में तथाकथित सेकुलर राजनीति के झंडाबरदारों ने यह भ्रम फैला रखा था कि बिना मुस्लिम मतदाताओं के सहयोग के देश में कोई सरकार नहीं बन सकती। लेकिन नरेन्द्र मोदी की लगातार तीन बार सत्ता में वापसी ने इस भ्रम की हवा निकाल दी। यही हाल इस बार बंगाल में भी हुआ। मुस्लिम वोट बैंक के नशे में आकण्ठ डूबी टीएमसी को बंगाल की जनता ने बता दिया कि इस फॉर्मूले के बिना भी सत्ता बदली जा सकती है। यही हाल कांग्रेस का असम में हुआ है। इन चुनावों का सबसे बड़ा सबक इन विपक्षी दलों के लिए यही है कि वोट बैंक के तुष्टीकरण और समर्पण के फेर में यदि आपने समाज के बहुसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार बंद नहीं किया, तो वह भी एकजुट होकर आपको सत्ता से बाहर कर सकता है। बिहार के चुनाव परिणामों ने चेताया था कि वहां का हिन्दू जातियों में बंटने को तैयार नहीं है और उसकी अनदेखी भारी पड़ेगी, लेकिन विपक्ष ने कुछ नहीं सीखा। इन चुनावों ने यह भी साबित कर दिया कि विपक्ष यदि मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करे तो वह सेकुलर, और बीजेपी हिन्दू वोटों को एकजुट करे तो वह साम्प्रदायिक—यह दोहरा रवैया अब नहीं चल सकता। आप जैसा बोओगे, वैसा ही काटने को तैयार रहो। असम और बंगाल में कांग्रेस के जीते विधायकों में एक को छोड़कर सभी मुस्लिम हैं; लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? सत्ता तो नहीं मिली, मुस्लिम-परस्ती का ठप्पा और लग गया। 2014 की हार के बाद एंटोनी समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि कांग्रेस हिन्दू विरोधी पार्टी की छवि के कारण हारी है। लेकिन कांग्रेस और सहयोगियों (टीएमसी और डीएमके) ने कोई सबक नहीं सीखा और उग्र हिन्दू विरोध का राग अलापते रहे। नतीजा सामने है। अब जनता किसी एक वर्ग के वोट बैंक की गुलामी करने वालों को चुनाव जितवाने को तैयार नहीं है।
​ममता बनर्जी ने अपने शासन में केंद्र सरकार और खासकर नरेंद्र मोदी के प्रति जो दुश्मनी वाला रवैया अपनाया, उससे बंगाल और उसकी जनता को कई केन्द्रीय योजनाओं से वंचित होना पड़ा। यही हाल डीएमके के स्टालिन और कुछ हद तक पिनराई विजयन का केरलम में था। हद तो तब हो गई जब केवल मोदी विरोध में इन दलों ने 'महिला आरक्षण विधेयक' पास नहीं होने दिया। यही काम दिल्ली में केजरीवाल कर रहे थे; उन्हें भी जनता ने सत्ता से बाहर कर दिया। और अब इन चुनाव परिणामों ने फिर यह साबित कर दिया कि केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के साथ अनावश्यक और दुश्मनी की हद तक विरोधी व्यवहार जनता को स्वीकार्य नहीं है। भारतीय संविधान का संघवाद केंद्र और राज्य सरकारों के परस्पर सहयोग का प्रावधान करता है। जनता को विकास और अपना हित चाहिए जो इन सरकारों के चलते संभव नहीं था और इसीलिए जनता ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। ममता बनर्जी और स्टालिन के परिवारवाद को भी जनता ने नकार दिया। इसके पहले बिहार की जनता लालू के परिवारवाद को नकार चुकी है।
​जो राहुल कल तक ममता को कोस रहे थे, वे फिर अपने पुराने 'वोट चोरी' के खटराग पर लौट आये हैं। ममता ने तो FIR के बहाने चुनाव आयोग के खिलाफ जंग ही छेड़ दी थी। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस सम्बन्ध में उनकी किसी बात को नहीं माना, लेकिन उन्होंने अपने 'मुर्गें की डेढ़ टांग' वाला व्यवहार नहीं छोड़ा। उनके भतीजे अब कहने लगे हैं कि ईवीएम को बदल दिया गया। हारने के बाद भी ममता और उनके साथी—चाहे राहुल हों या संजय राउत या अखिलेश—हर कोई चुनाव आयोग को गरियाने में लगा है; जबकि जनता ने उनकी किसी भी बात पर भरोसा नहीं किया। केरलम और तमिलनाडु में चुनाव आयोग 'अच्छा' और असम व बंगाल में 'बेईमान'—यह दोहरा चरित्र विपक्ष की हताशा और हार का कारण है। राहुल और ममता तो अपने साथियों स्टालिन और पी. विजयन से भी कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं, जिन्होंने पूरी शालीनता से जनादेश को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस समेत देश के पूरे विपक्ष को अपनी हार पर आत्ममंथन करना चाहिए। यदि ये दल इन परिणामों से कोई सबक नहीं सीखते और इसी तरह चुनाव आयोग पर आरोप लगाते रहे, तो 2027 और उसके बाद के चुनावों में उन्हें और बड़ी हार के लिए तैयार रहना चाहिए।

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