ओमप्रकाश चौधरी
01 May, 2026
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बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनाव के बाद लोकतंत्र याद आ रहा है। उनका ताजा बयान आया है कि उन्होंने ऐसा लोकतंत्र नहीं देखा जैसा विधानसभा चुनाव के अंतिम दौर में उन्हें बंगाल में दिखा। उनके निशाने पर देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तो हमेशा रहते ही हैं। जब से एसआईआर शुरू हुआ और बंगाल में चुनाव की घोषणा हुई, तब से चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त भी उनके निशाने पर हैं। लोकतंत्र वाले बयान में उनका ताजा शिकार बना है देश का सबसे अनुशासित पुलिस बल सीआरपीएफ। उन्होंने इस बल को 'अत्याचारी' तक करार दे दिया। नीमच सीआरपीएफ की जन्मस्थली है और पिछले कई सालों से मेरे जैसे इस शहर के नागरिक इस बल को देख रहे हैं, उन्हें ममता के इस बयान से दुःख पहुँचा होगा।
पिछले विधानसभा चुनाव में चुनावी हिंसा में 52 लोग मारे गए थे। पंचायत चुनावों में 150 से अधिक लोग मरे थे। लेकिन इस बार चुनावी हिंसा न के बराबर हुई है, उसी सीआरपीएफ के कारण जिसे वे 'अत्याचारी' बता रही हैं। एक समय था जब उत्तर प्रदेश और बिहार चुनावी हिंसा के लिए बदनाम थे, लेकिन इस मामले में बंगाल नंबर एक था। यह सिलसिला 35 साल के वामपंथी राज और उसके बाद ममता शासन में भी बदस्तूर जारी रहा। बल्कि ममता राज में तो चुनाव के पहले और चुनाव जीतने के बाद भी हिंसा होती थी—पहले मतदाता को डराने के लिए और बाद में विरोधी मतदाताओं को सबक सिखाने के लिए।
पिछले कुछ सालों से विपक्ष ने हर उस संस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं जो उसकी चुनावी जीत या उसके उद्देश्य के आड़े आती है। इसमें सेना से लेकर चुनाव आयोग और न्यायालय तक सब शामिल हैं। जब से एसआईआर शुरू हुआ, सबसे ज्यादा बवाल बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने मचाया। वकील बनकर सुप्रीम कोर्ट तक में खड़ी हो गईं परन्तु सिवाय फटकार के कुछ नहीं मिला। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर में हटाए नामों पर आपत्तियों की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति कर दी। फिर भी ममता का चुनाव आयोग को गरियाना जारी रहा। इसमें उनका साथ दिया नामी वकील कपिल सिब्बल ने। बंगाल सरकार के वकील के रूप में दिए गए उनके किसी तर्क को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना। फिर भी वे चुनाव आयोग पर आरोप लगाने से नहीं चूके।
ममता दीदी के 'बंगाली लोकतंत्र' के संस्करण में मतदाताओं को डराने-धमकाने का दौर पिछले कई चुनावों से जारी था और चुनाव आयोग असहाय देखता रहता था। इस बार भी वे, उनके भतीजे और उनके नेता; देश के गृहमंत्री, चुनाव आयोग, चुनाव पर्यवेक्षक से लेकर बंगाल की पुलिस और आम मतदाता तक को धमकाने में लगे रहे। यही नहीं, चुनाव आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद कई पोलिंग स्टेशनों पर ममता के उम्मीदवारों ने वोटिंग मशीन में बीजेपी उम्मीदवार के नाम पर टेप तक चिपका दिए, क्योंकि वे मानते थे कि कोई शिकायत नहीं करेगा।
लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने ममता के इस लोकतंत्र को खत्म करने के लिए कमर कस रखी थी। नतीजा उनकी हिंसा, डराने–धमकाने की राजनीति और उनका यह लोकतंत्र सब धराशायी हो गया। ममता दीदी हर चुनाव में आखिरी घंटों में मतदान करने जाती थीं, क्योंकि उन्हें पता था कि बाकी समय उनके गुंडे क्या करने वाले हैं। लेकिन इस चुनाव में वे दिन भर एक मतदान केंद्र से दूसरे मतदान केंद्र तक घूमती रहीं और यहाँ तक कह गईं कि "मेरी पुलिस ही मुझे नहीं पहचान रही है।" और धमकाने के अंदाज में बोल गईं कि "4 तारीख के बाद केंद्रीय बल तो चले जाएंगे, तुम्हें यहीं रहना है।" ममता दीदी का यही 'बंगाली लोकतंत्र' इस बार नहीं चला।
जिस 'इंडी' गठबंधन का झुनझुना वे कभी-कभी बजाती हैं (केवल इसलिए कि उसकी नेता वे बन जाएं), उस गठबंधन को उन्होंने बंगाल में आज तक घुसने नहीं दिया। उसी गठबंधन के झंडाबरदार राहुल गांधी बंगाल में आकर कह गए कि बीजेपी के बंगाल में जमने का कारण ममता दीदी का कुशासन है। राहुल को यह तो मालूम था कि उनकी पार्टी बंगाल में कहीं नहीं है, लेकिन वे ममता की लुटिया डुबाने में अपना योगदान जरूर दे गए। अब ममता यह न कहें तो और क्या कहें कि उन्होंने ऐसा लोकतंत्र पहले नहीं देखा। पिछला विधानसभा चुनाव हो या 2024 का लोकसभा चुनाव, जिस कांग्रेस और उसके नेताओं की हिम्मत नहीं हुई ममता के विरोध में बोलने की, उसी कांग्रेस के सबसे बड़े नेता इस चुनाव में उनके खिलाफ बोल गए। यानी ममता का डर कांग्रेस तक पर खत्म हो गया। जो ममता दीदी डराने और धमकाने की राजनीति को ही लोकतंत्र मानती रहीं, उनके लिए यह अनुभव नया था। तब उन्हें मजबूरन कहना पड़ा कि ऐसा लोकतंत्र उन्होंने पहली बार देखा है।
इस बार चुनाव आयोग ने चाहे एसआईआर हो या विधानसभा चुनाव, ममता दीदी की एक नहीं चलने दी। अपने अधिकारों का भरपूर उपयोग किया। कोलकाता से लेकर शहरों के थानों तक, चुनाव में गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों को हटाने में कोई कोताही नहीं की। बंगाल की पुलिस की जगह हर चुनाव बूथ पर केंद्रीय पुलिस बलों को तैनात किया। नतीजा मतदाताओं को डराने-धमकाने का 'ममता ब्रांड लोकतंत्र' चला ही नहीं। मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि 1977 के बाद पहली बार पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव हुआ है। और यही ममता जी के दुःख का कारण है; इसलिए उनका रोना जायज है कि ऐसा सही लोकतंत्र उन्होंने भी दशकों बाद देखा है। आश्चर्य है कि जिन ममता बनर्जी ने वामपंथी राज के डर भरे चुनाव देखे और उनसे लड़कर जीतीं, उन्होंने अपने 15 साल के शासन में लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने का नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। और आज जब चुनाव आयोग ने उस जंगल राज को धराशायी कर दिया, तो उन्हें लोकतंत्र याद आ रहा है।
- ओमप्रकाश चौधरी