न्यूज डेस्क
05 March, 2026
अन्य
नीमच। सेवा और मानवता की अनूठी मिसाल पेश करते हुए विजिया मित्र मंडल द्वारा प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी 24वीं लावारिस अस्थि कलश यात्रा गुरुवार को श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में निकाली गई। सुबह 8.30 बजे नीमच सिटी रोड स्थित मुक्तिधाम से शुरू हुई इस यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और लावारिस अस्थि कलशों को नम आंखों से श्रद्धांजलि दी।
यात्रा के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। बैंड-बाजों की धुन पर “मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी”, “गंगा तेरा पानी अमृत”, “हर-हर भोले नमः शिवाय” जैसे भजनों के साथ गंगा माता और भगवान शिव का गुणगान किया गया। यात्रा मुक्तिधाम से प्रारंभ होकर बारादरी चौराहा, बड़े बालाजी मंदिर, शीतला माता मंदिर, नृसिंह मंदिर, श्रीराम चौक, बिचला गोपाल मंदिर, घंटाघर चौक, शनि मंदिर, श्रीराम मंदिर, जाजू बिल्डिंग और बावड़ी वाले बालाजी मंदिर सहित शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरी।
यात्रा मार्ग में कई स्थानों पर व्यापारी, दुकानदार, श्रद्धालु महिलाएं और समाजजन बड़ी श्रद्धा के साथ मौजूद रहे। लोगों ने अस्थि कलशों पर पुष्प अर्पित किए, अगरबत्ती लगाई और श्रद्धानिधि चढ़ाकर दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि दी। पूरे मार्ग में श्रद्धा, संवेदना और मानवता का अनोखा संगम देखने को मिला।
इस वर्ष मंडल के 11 सदस्य 11 निराश्रित और लावारिस लोगों की अस्थियां लेकर हरिद्वार के लिए रवाना हुए हैं। इनमें गोपाल सिंघल, सत्यनारायण शर्मा, अनिल मित्तल, राजेश गोयल, संजय गोयल, दिलीप मित्तल, राकेश सफा, अरुण सैनी सहित अन्य सदस्य शामिल हैं। मंडल के सदस्य नीमच से रेल द्वारा चित्तौड़गढ़ पहुंचे, जहां से शाम 4 बजे ट्रेन के माध्यम से हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया। 6 मार्च को हर की पैड़ी पर पूर्ण विधि-विधान से इन अस्थियों का तर्पण और गंगा में विसर्जन किया जाएगा। इसके बाद जरूरतमंदों को भोजन कराकर दक्षिणा भी दी जाएगी।
विजिया मित्र मंडल पिछले कई वर्षों से लावारिस और गरीबों की अंत्येष्टि का कार्य भी कर रहा है। मंडल अब तक 23 वर्षों में करीब 700 अस्थियों का गंगा में विधिवत तर्पण और विसर्जन कर चुका है। साथ ही मंडल द्वारा गोमाबाई रोड स्थित गंगा वाटिका में मूक प्राणियों और पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था भी निरंतर की जा रही है।
श्वान भी चला अंतिम यात्रा में साथ
अस्थि कलश यात्रा के दौरान एक भावुक दृश्य भी देखने को मिला। एक श्वान मुक्तिधाम से ही यात्रा के साथ चलता रहा और विसर्जन स्थल राजेंद्र प्रसाद स्टेडियम के बाहर तक पहुंच गया। वहां वह काफी देर तक शांत बैठा रहा। कई लोगों ने इसे आत्मा के प्रति निष्ठा और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक माना।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्वान को अंतिम रोटी दान करना पितृ आत्मा की शांति से जुड़ा माना जाता है। महाभारत में भी वर्णन मिलता है कि जब युधिष्ठिर स्वर्ग की ओर जा रहे थे, तब एक कुत्ता अंत तक उनके साथ चलता रहा, जो निष्ठा और सत्य का प्रतीक माना जाता है।