द वाॅचमेन पोस्ट
18 February, 2026
राजनीति
नीमच। सवाल सीधा है—शहर गुमटियों में समा गया है या गुमटियां शहर को निगल रही हैं? नीमच में अवैध गुमटियों पर चली हालिया मुहिम अब फिर कटघरे में है। नगर पालिका ने लाव-लश्कर के साथ अभियान छेड़ा, जेसीबी गरजी, नोटिस थमाए गए, तस्वीरें खिंचीं—लेकिन कुछ ही दिनों में वही गुमटियां फिर उसी जगह तनकर खड़ी हैं।
बस स्टैंड, सीआरपीएफ रोड, श्मशान मार्ग, टेगोर मार्ग, मीना बाजार—हर मोर्चे पर “कार्रवाई” का शोर हुआ।
पर नतीजा? नगरपालिका डाल-डाल चली, कब्जाधारी पात-पात। कार्रवाई की सुर्खियां बनीं, पर जमीन पर कब्जे फिर तन गए जस के तस।
हटे, फिर जमे—दोगुनी रफ्तार से
सीआरपीएफ रोड से हटाई गई गुमटियां दूसरे ही दिन सजी-धजी लौट आईं। मुक्तिधाम रोड पर निर्माण में बाधा बनी टपरियां पहले एक तरफ थीं, अब दोनों ओर अधिक संख्या में कतार में। बस स्टैंड पर हटाने पहुंची टीम के बाद फिर वही नज़ारा। सवाल उठता है—क्या यह अभियान था या औपचारिकता?
दुग्ध पार्लर के नाम पर सब कुछ
शहर में कई गुमटियां “दुग्ध पार्लर” के नाम पर हैं, पर वहां दूध नदारद लेकिन चाय, सिगरेट, गुटखा, गैरेज, टपरी—सब कुछ खुलेआम बिक रहा है। नियम किताबों में हैं, ज़मीन पर नहीं।
बेरोजगारी या प्रभाव का कवच?
सूत्र बताते हैं—कई गुमटियां रसूख के नाम पर खड़ी हैं। राजनीतिक संबद्धता, सामाजिक पहचान, छात्र राजनीति—इन सबके साये में नोटिस ठंडे पड़ जाते हैं। खरीद-फरोख्त, किराए और वसूली की भी चर्चाएं तेज़ हैं। असर यह कि “नामी” ने रखी तो पास ही आम भी रख दे—प्रशासन हटाएगा नहीं।
पीजी कॉलेज के सामने नोटिस देकर कदम पीछे खींच लेना इस “मॉडल” की मिसाल बन गया है। प्रभाव पड़ा तो कार्रवाई रुकी—यह संदेश शहर में तेजी से फैला है।
जवाब मौन
इस पूरे मामले में नगर पालिका की मुख्य नगरपालिका अधिकारी दुर्गा बामनिया से संपर्क का प्रयास किया गया, पर कॉल रिसीव नहीं हुई। खबर लिखे जाने तक आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली।
मुद्दा साफ है: अगर अभियान सच में था तो गुमटियां फिर कैसे लौटीं? और अगर लौटनी ही थीं, तो हटाने का शोर क्यों?