डेस्क न्यूज
22 January, 2026
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जयपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस की उस प्रचलित लेकिन विवादित कार्यप्रणाली पर करारा प्रहार किया है, जिसमें गिरफ्तार व्यक्तियों को थाने के बाहर बैठाकर उनकी तस्वीरें खींची जाती हैं और फिर उन्हें मीडिया व सोशल मीडिया में अपराधी की तरह पेश किया जाता है। न्यायालय ने इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक करार देते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और गरिमा के अधिकार का खुला उल्लंघन बताया है।
दोष सिद्धि से पहले अपराधी बनाना कानून के खिलाफ
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने स्वप्रेरणा से संज्ञान लेते हुए सख्त टिप्पणी की कि
“किसी आरोपी को दोष सिद्ध होने से पहले सार्वजनिक रूप से अपमानित करना कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के विपरीत है।”
कोर्ट ने अंतरिम आदेश में निर्देश दिए कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों की जो भी तस्वीरें या वीडियो सोशल मीडिया, वेब पोर्टल्स अथवा अन्य डिजिटल माध्यमों पर अपलोड किए गए हैं, उन्हें तत्काल हटाया जाए।
वरिष्ठ अधिवक्ता की तस्वीर वायरल होने पर भी कोर्ट सख्त
हाईकोर्ट ने जोधपुर में एक वरिष्ठ अधिवक्ता को थाने में बैठाकर उसकी तस्वीरें वायरल किए जाने के मामले में भी स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने जोधपुर पुलिस आयुक्त को आदेश दिया कि अधिवक्ता मोहन सिंह रत्नू की सभी वायरल तस्वीरें 24 घंटे के भीतर हर प्लेटफॉर्म से हटाई जाएं और इसकी अनुपालन रिपोर्ट पेश की जाए।
महिलाओं की तस्वीरें वायरल करने का मामला और गंभीर
जैसलमेर से जुड़े एक अन्य प्रकरण में कोर्ट को बताया गया कि कई गिरफ्तार व्यक्तियों—जिनमें महिलाएं और अविवाहित युवतियां भी शामिल हैं—की तस्वीरें थाने के बाहर बैठाकर खींची गईं और मीडिया में प्रसारित की गईं। आरोप यहां तक लगे कि कुछ मामलों में अभियुक्तों को अपमानजनक परिस्थितियों में, यहां तक कि कपड़े उतारकर बैठाया गया।
कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी जताते हुए जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक को शपथ पत्र दाखिल कर जवाब देने के निर्देश दिए हैं।
‘सोशल मीडिया ट्रायल’ खतरनाक प्रवृत्ति
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि पुलिस आरोपी को अपराधी की तरह पेश कर खुद जज की भूमिका निभा रही है, जो एक खतरनाक और गैरकानूनी प्रवृत्ति है।
कोर्ट ने माना कि एक बार तस्वीरें वायरल हो जाने के बाद व्यक्ति पर स्थायी सामाजिक कलंक लग जाता है, जो बरी होने के बाद भी नहीं मिटता—विशेष रूप से महिलाओं के मामलों में इसके दुष्परिणाम बेहद गंभीर होते हैं।
सरकार को नोटिस, 28 जनवरी को अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। अधिवक्ता देवकीनंदन व्यास को न्यायमित्र नियुक्त किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।