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ग्वालटोली में छठ महापर्व की भव्य छटा, डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर की गई मंगलकामनाएं

डेस्क न्यूज़ 27 October, 2025 अन्य

नीमच। पूर्वांचल की महान लोक आस्था और सूर्य उपासना का पर्व छठ महापर्व सोमवार, 27 अक्टूबर को नीमच के ग्वालटोली क्षेत्र में भक्तिभाव और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। सार्वजनिक तालाब के समीप स्थित पंडित दीनदयाल वाटिका के छठ माता मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
संध्या समय जब सूर्य देव अस्ताचल की ओर अग्रसर थे, तब व्रती महिलाओं ने जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया और परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की दीर्घायु तथा सर्वकल्याण की कामना की। पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित महिलाएं कलश, नारियल, फल, ठेकुआ और पूजा सामग्री से सजी डलिया लेकर छठ घाट पर पहुंचीं। पूरे वातावरण में “जय छठी मइया” के जयघोष गूंजते रहे, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति रस में सराबोर हो गया।
चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व — नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य  के चार पवित्र चरणों में संपन्न होता है। 25 अक्टूबर को नहाय-खाय के साथ शुभारंभ हुआ, जब श्रद्धालु महिलाओं ने स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण किया। 26 अक्टूबर को खरना के दिन निर्जला उपवास रखकर संध्या समय गुड़-चावल की खीर का प्रसाद ग्रहण किया गया। 27 अक्टूबर को संध्या अर्घ्य के साथ पर्व ने भक्तिभाव की चरम सीमा छू ली। अब 28 अक्टूबर की प्रातः उगते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के बाद महिलाएं व्रत पूर्ण करेंगी और प्रसाद वितरण के साथ पर्व का समापन होगा।
आयोजन समिति के सदस्य अनिल कुशवाह और महेंद्र सिंह ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस बार भी ग्वालटोली तालाब पर भैया सेवा समिति और समाजजन के सहयोग से भव्य आयोजन किया गया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा एवं साफ-सफाई के पुख्ता इंतजाम किए गए।
ग्वालटोली क्षेत्र में छठ पूजा अब केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिक एकता, श्रद्धा और उत्तर भारतीय लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुकी है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने की यह प्राचीन परंपरा मानव और प्रकृति के बीच अटूट संबंध तथा जीवनदायिनी ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का अनुपम संदेश देती है।

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