पंकज मलिक
05 January, 2026
भगवान राम के आदर्श, मर्यादा और नैतिकता की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी आज इंदौर में दूषित पानी से हुई 17 निर्दोष नागरिकों की मौत के बाद खुद अपने ही दावों के कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। सवाल सीधा है—क्या भाजपा की नैतिकता सिर्फ भाषणों और चुनावी मंचों तक सीमित है या फिर वह ज़मीन पर भी जवाबदेही निभाने का साहस रखती है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से निकली और हिंदू वोट बैंक के सहारे वर्षों से सत्ता पर काबिज भाजपा को अब यह स्वीकार करना होगा कि यह घटना कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की गंभीर विफलता है। पानी जैसी बुनियादी जरूरत उपलब्ध कराने में नाकामी सीधे-सीधे जनजीवन के साथ खिलवाड़ है। ऐसे में इस पूरे मामले की नैतिक जिम्मेदारी नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की बनती है और नैतिकता के आधार पर उनसे तत्काल इस्तीफा लिया जाना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि जब कोई पार्टी जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर संवेदनहीन हो जाती है, तो उसका राजनीतिक पतन तय हो जाता है—कांग्रेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
भाजपा यदि इस मुगालते में है कि वह हमेशा हिंदू तुष्टीकरण के आधार पर चुनाव लड़ती रहेगी और हर गलती को जनता माफ करती रहेगी, तो यह उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी। क्योंकि जब सवाल जीवन और मौत का हो तब धर्म, विचारधारा और नारे गौण हो जाते हैं—सिर्फ इंसानी पीड़ा और आक्रोश बचता है।
सबसे बड़ा विरोधाभास तब सामने आता है, जब बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू दास की मौत पर भाजपा और हिंदू संगठनों ने पूरे देश में प्रदर्शन किए, लेकिन इंदौर में अपने ही शहर में 17 लोगों की मौत पर वही भाजपा मौन साधे बैठी है। यह दोहरा चरित्र भाजपा की कथनी और करनी के अंतर को उजागर करता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो सेवा, समर्पण और समाज की सुरक्षा की बात करता रहा है, उसे भी इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक इकाई भाजपा को आईना दिखाने की जरूरत है। तभी संघ की वह पारदर्शी और नैतिक छवि बनी रह पाएगी, जिससे आम जनता भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करती है।
इस मामले में कुछ वरिष्ठ नेताओं के बयान न केवल असंवेदनशील बल्कि शर्मनाक भी हैं। ऐसे बयानों पर दिग्गजों का बचाव करने के बजाय यदि पार्टी और सरकार त्वरित एवं कठोर कार्रवाई करती है, तो इससे न केवल भाजपा की बल्कि पूरी सरकार की छवि में सुधार होगा। मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर तो कार्यवाही कर दी गई पर उन जनप्रतिनिधियों पर भी कार्यवाही होना चाहिए जो इसके लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदार है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव का यह पहला कार्यकाल है। यदि राष्ट्रीय नेतृत्व चाहता है कि यह कार्यकाल स्थिर और दीर्घकालिक हो, तो उसे मुख्यमंत्री को “फ्री हैंड” देना होगा। मंत्रियों और अधिकारियों पर नकेल कसने जैसे कड़े निर्णय ही मोहन यादव को एक मजबूत और निर्णायक मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
अन्यथा, इंदौर में दूषित पानी से हुई 17 मौतें केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि भाजपा की नैतिक राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर इतिहास में दर्ज होंगी—और इस परीक्षा में चुप्पी कभी भी सही उत्तर नहीं होती।