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मूंछों पर हास्यास्पद और अतार्किक विमर्श के बीच असहज नेता

कपिलसिंह चौहान 07 September, 2025 अन्य

नीमच में पिछले हफ्ते कई ‘मर्द’ बड़े असहज और परेशान होते रहे...मर्दों याने पुरुषों की यह हालत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की टिप्पणी के बाद हुई। तब, जब पटवारी ने विधायक दिलीप सिंह परिहार को ‘मूंछो वाला विधायक’ कह दिया। पटवारी का बड़बोलापन तो कई बार उनके लिये आत्मघाती ही साबित होता रहा है लेकिन आज बात भाजपा के अतार्किक विमर्श की है।           

जीतू पटवारी की टिप्पणी का विरोध करने के लिए आगे आए परिहार समर्थक कार्यकर्ताओं के तर्कों से भाजपा के ही अन्य ‘मर्द’ नेता ज्यादा असहज और परेशान हो उठे। विधायक दिलीप सिंह परिहार की मूंछो कि पैरवी में इस कदर भयानक और अतार्किक कुतर्क दिये गये कि मूंछ ना रखने वाले भाजपा के मूँछ मूँडे नेताओं के लिये विधायक परिहार के आसपास रहना और मंच साझा करना ही असहज हो गया।

सोशल मीडिया, फेसबुक और व्हाट्सएप तो ठीक पर विधायक दिलीप सिंह परिहार के साथ मंच साझा करने वाले ‘क्लीन शेव्ड’ नेताओं की फजीहत ज्यादा हुई। विधायक परिहार के मंचो से ही कहा गया कि ‘मूंछो वाला मर्द होता है” तो उसी मंच पर बैठे ‘मूंछ मूंडे’ मर्द नेताओं को भी इस बात पर मजबूरन ताली बजाना पड़ी।    

जीतू पटवारी का विरोध करने के लिए मुंछो को आन-बान-शान से जोड़ा गया. कहा गया—“मूंछ नहीं तो पूछ नहीं…” यहाँ तक कि मूंछों को ‘सफल नेतृत्व का पैमाना’ घोषित कर दिया गया !

लेकिन किस आधार पर ! यह कैसे तर्क हैं ? इन विवेकहीन व बेतुके तर्कों के साथ उनके समर्थक विधायक परिहार के मुंछो पर ताव देते फोटो पोस्ट करते रहे।

इस लिहाज से जब कद्दावर भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह और उप्र के सख्त छवि के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी क्लीन शेव्ड हैं तो क्या सिर्फ मुंछे नहीं रखने की इस खास वजह से उनकी नेतृत्व क्षमता पर कोई सवाल उठाया जा सकता है ! और सम्मानीय अटल बिहारी वाजपेयी जिसने भाजपा को अपनी सांस्कृतिक गरिमामय शब्दावली से पोषित किया, स्व्यं भी क्लीन शेव्ड रहते थे। ऐसे में उनके अनुयायियों का मूंछो को मर्दानगी और नेतृत्व का पर्याय बताना इनके बोद्धिक पतन का परिचायक नहीं है ?     

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मूंछें और दाढ़ी पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के प्रभाव से उगती हैं. अब यदि महिलाओं को मुंछ नहीं होती तो क्या वे बेहतर नेतृत्वकर्ता नहीं हो सकतीं. भाजपा में ही स्व.सुषमा स्वराज इसका उदाहरण हैं‌—अपने परिश्रम, साहस और समर्पण से उन्होने नेतृत्व की ऊँचाइयाँ हासिल कीं। ऐसे में नीमच के कार्यकर्ताओं के तर्क न केवल हास्यास्पद हैं बल्कि आधी आबादी और महिला शक्ति का भी अपमान हैं।      

अपने ही नेताओं के लिए असहजता पैदा करने वाली इस स्थिति और विमर्श के निम्नतम स्तर से बढ़कर असल चिंता की बात यह है कि भाजपा और आरएसएस की पाठशाला से निकले कार्यकर्ता—जो कभी तार्किक और विवेकी माने जाते थे—अब उनके ऐसे विवेकहीन और हास्यास्पद तर्कों से पार्टी अपनी सांस्कृतिक पहचान कहीं खोती जा रही है।        

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