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पद और उसका माया जाल    - ओमप्रकाश चौधरी

ओमप्रकाश चौधरी 22 May, 2026 अन्य

पद और उसके लिए दीवानगी भी अजीब है ,यह अगर एक बार हावी हो जाए तो व्यक्ति को उसके सिवा और कुछ नही सूझता | यदि पद उसके पास है तो उसे हर कीमत पर अपने पास बनाए रखने की कोशिश करता रहता है | और यदि नही है तो पद पाने के लिए सारे द्रावड़ी प्राणायाम करने से नही चूकता | बाबा तुलसीदास ने लिखा है “को अस जन्मा जग माही  | प्रभुता पाई जाहि मद नाही” अर्थात पद और अहंकार का साथ चोली दामन का है |  | पद और उससे मिली सत्ता का अंहकार जब सर पर चढ़ कर बोलता है तो व्यक्ति  को अपनी गलतियाँ भी दिखाई नही देती ,और वही गलतियां उसे एक दिन ले डूबती हैं लेकिन तब भी  अपने डूबने का ठीकरा दूसरों के माथे पर फोड़ने से नही चूकता   | विश्वास न हो तो बंगाली दीदी  का हश्र देख लीजिये | पद और सत्ता का अंहकार उनके सर पर इस बुरी तरह से सवार था कि जनता की नाराजगी उन्हें दिखाई ही नही दे रही थी| नतीजा जब वे चुनावों में चारों खाने चित हो गई तब भी अपनी हार के लिए  कभी चुनाव आयोग को  तो कभी सुरक्षा बलों को जिम्मेदार ठहराने लगी | वे यहीं नहीं रुकी हारने के बाद भी पद छोड़ने को राजी नही हुई नतीजा बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर पद से बर्खास्त होना पडा |  दूसरी तरफ जो पद को अपनी जागीर समझते हैं वे पिछले बारह साल से उसके अभाव में  जल बिन मछली की तरह तड़प रहें हैं  और पद पाने के लिए बजाय अपनी लाइन लम्बी करने के अपने विरोधी की लाइन छोटी करने में लगे रहते हैं नतीजा हार चुनाव दर चुनाव | फिर भी लगातार मिलती हार से कुछ सीखने के बजाय उनमें बदहवासी और स्तरहीन भाषा का प्रयोग दोनों बढ़ रहा है |
यह तो हुई राजनीति में पद और उससे जुडी चूहा बिल्ली दौड़ की कहानी | पदों की यह लालसा और उसका खेल हर उस जगह जारी है जहां पद और उससे जुडी चमक दिखाई देती है | एक पुराना किस्सा है एक बाहुबली एक संस्था के अध्यक्ष बन गए  ,बाद में उस संस्था में जब भी चुनाव का अवसर आता वे कह देते अध्यक्ष तो वे हैं ही बाकी पदों पर चुनाव कर लो | अब मरता क्या न करता होता वही था जो अध्यक्षजी  चाहते थे | कई संस्थाओं में तो पदाधिकारी इस बहाने के साथ जमे रहते हैं कि मैं तो छोड़ना चाहता हूँ पर कोई पद पर आना ही नहीं चाहता | इसलिए मजबूरी में यह वजन ढो रहा हूँ | अब कोई उनसे पूछे कि भैया जब आप नही रहोगे तब क्या होगा ? कभी तो यह जिम्मेदारी किसी और को निभानी ही पड़ेगी | लेकिन पद का मोह ऐसा होता है कि नया पदधारी तैयार करने के बजाय खुद ही जमे रहते हैं | ये लोग ऐसे वट वृक्ष होते हैं जो नेतृत्व का तिनका तक उगने नही देते | कुछ लोग आगे की सोच कर खुद को किंग मेकर के आवरण में छुपा लेते हैं | ऐसे लोग परदे के पीछे से सत्ता चलाने के लिए अपने इशारों पर चलने वालों को पदाधिकारी बनवा देते हैं |और फिर उन्हें इशारों पर नचाते रहते हैं |   देश ने बरसों पहले कठपुतली  सत्ता  का यह खेल बखूबी देखा  भी और उसकी कीमत भ्रष्टाचार के रूप में चुकाई भी | 
कुछ लोगों को फितरत रहती है कि वे किसी भी संस्था के सदस्य तभी तक रहते हैं जब तक वे संस्था में प्रमुख  के पद पर विराजमान रहे | जैसे ही वे पद से निवृत्त हुए किसी न किसी बहाने संस्था से निकल कर नई  संस्था का गठन करके उसके प्रमुख पद पर विराजमान हो जाते हैं | उनका यह क्रम निरंतर चलता रहता है | जब पद पाना ही जीवन का लक्ष्य बन जाए तो फिर हर वह तरीका आजमाया  जाता है जिससे पद बरकरार रहे | ऐसे व्यक्ति हमेशा इस प्रयत्न में लगे रहते हैं कि जब भी अवसर मिले कोई उनका नाम पद के लिए आगे बढ़ा दे | ऐसा करने के लिए वे हर समय दो चार समर्थकों को  तैयार रखते हैं | परन्तु कभी कभी ऐसा समय भी आता है जब उनका नाम आगे बढाने के लिय कोई आगे नही आता | तब खुद ही कुछ प्रपंच करना पड़ता है | पद के माया जाल में उलझे व्यक्ति को पद पाने के लिए यदि किसी संस्था या समिति को विभाजित भी करना पड़े तो यह कार्य धर्म सम्मत है उनके लिए क्योंकि उनका अस्तित्व ही पद के कारण है | कई बार एक अनार और सौ बीमार की स्थिति भी पैदा हो जाती है |  तब पद एक या दो ही होते हैं और दावेदार उससे ज्यादा और  वह भी सभी तोपचंद| ऐसे में उनके बीच की प्रतियोगिता देखने लायक होती है और इसमें जो विजयी होता है वह सोचता है मैंने गढ़ जीत लिया |
पदों की चाह की इस दुनिया में  कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें किसी पद की चाह कभी नहीं होती वे केवल काम करने में विश्वास रखते हैं | पद के लिए जीने वालों को ऐसे लोगों से कोई ख़तरा नही होता | कुछ ऐसे भी बिरले व्यक्तित्व पाए जाते हैं जिन्हें हर संस्था अपना प्रमुख बनाना गौरव का विषय समझती है , क्योंकि उनका पदासीन होना ही संस्था की सफलता की गारंटी होता है| ऐसे लोग चाहे या न चाहें पद उनके आगे पीछे घूमते रहते हैं | ऐसे लोगों को आप अध्यक्षों का अध्यक्ष भी कह सकते हैं | कुल मिलाकर पद और उसके चाहने वालों की महिमा  अपरम्पार है | पद वह फल है जिसे न खाने वाला तो पछता सकता है परन्तु खाने वाला तो शायद ही कभी पछताता है | पद मिल जाए और वह भी किसी मलाईदार संस्था का तो फिर तो क्या कहने | सोने में सुहागा हो जाता है | परन्तु पद का यह मायाजाल ऐसा है कि कुछ लोग हमेशा लगे रहते हैं कि पद मिल जाए और पद कभी उनके हाथ नही आता | ऐसे में एक दिन थक हार कर वे कहने लग जाते हैं कि मुझे पद की चाह कभी रही ही नहीं हाँ मिल जाता तो कुछ ऐसा कर जाता कि लोग याद रखते | पर क्या करूँ मुझे संस्था वालों ने  इस लायक समझा ही नही  | इसलिए पदाभिलाषी जरुर रहिये पर उसके लिए लालायित कभी मत रहिये | आप जितना दूर भागेंगे पद उतना आपके पास आयेगा ही एक दिन | आगे आपकी मर्जी |

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