9600 वर्गफीट जमीन लीज पर दे दी 30 साल के लिए! अवैध नामांतरण और लीज निरस्ती आदेश के बाद भी कब्जा कायम,पार्षदों ने दिया कब्जा छुड़ाने के लिए आवेदन

  नीमच
  डेस्क न्यूज
  26 May, 2026
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नीमच। शहर की बहुमूल्य नगरपालिका जमीन पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। करीब 9600 वर्गफीट (48×200) के भूखंड पर आवंटन से लेकर उपयोग परिवर्तन, लीज नवीनीकरण और निरस्ती के बाद भी कब्जा बरकरार रहने का मामला अब जनसुनवाई में उठ गया है।

यह जमीन योजना क्रमांक 18, भूखंड नंबर 15, वार्ड क्रमांक 9 में स्थित है, जो शहर के प्रमुख इलाके स्पेंटा पेट्रोल पंप और डाक बंगले के पास होने से और भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कैसे शुरू हुआ मामला
ज्ञापन के अनुसार वर्ष 1981-82 में यह जमीन प्रभुदयाल पिता मन्नालाल शर्मा को मात्र 3 वर्ष के लिए आरा मशीन और लकड़ी टाल संचालन हेतु आवंटित की गई थी।

 उद्देश्य बदला, नियम टूटे
आरोप है कि बाद में इस जमीन का उपयोग बदलकर वहां रेती और पत्थर का स्टॉक किया जाने लगा, जो मूल आवंटन के उद्देश्य के विपरीत है और नियमों का उल्लंघन है।

 लीज नवीनीकरण और निरस्ती का खेल
 बिना वैधानिक अनुमति के 2011 से 2041 तक लीज नवीनीकरण किया गया है। 08 जुलाई 2019 को लीज अनुबंध हुआ है।  01 अगस्त 2019 को वही लीज निरस्त भी कर दी गई

 इसके बाद भी सबसे बड़ा सवाल उठा कि जब लीज निरस्त हो चुकी, तो जमीन का कब्जा आज तक क्यों नहीं लिया गया?

 कब्जा किसके पास?
आवेदन में बताया गया कि वर्तमान में उक्त भूमि पर कब्जा घनश्याम शर्मा एवं आशिष उर्फ राजू जायसवाल से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है, जिनके नाम पर 2019 में नामांतरण किया गया।

नामांतरण पर भी सवाल
कथित वसीयत के आधार पर नामांतरण किया गया। वसीयत को न तो सक्षम न्यायालय में सिद्ध किया गया न ही वैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई इसके बावजूद नामांतरण आदेश जारी कर दिया गया। 

आवेदन में इसे अवैध और प्रभाव शून्य कार्रवाई बताया गया है।

 2021 के बाद भी ढील क्यों?
 22 अक्टूबर 2021 को लीज निरस्ती संबंधी पत्र जारी हुआ।इसके बावजूद आज तक नगरपालिका ने जमीन का कब्जा वापस नहीं लिया।
जबकि पूर्व में यह भूखंड नगरपालिका परिषद के पक्ष में निर्णित हो चुका है।

किसने उठाया मुद्दा
मंगलवार को कलेक्टर जनसुनवाई में एडवोकेट शशिकुमार कल्याणी के साथ भाजपा पार्षद—
रूपेंद्र लॉक्स, आलोक सोनी, कैलाश धाकड़ और अरविंद जैन ने यह मामला उठाया।

 पार्षदों के आरोप
पार्षदों ने सीधा आरोप लगाया कि बिना प्रशासनिक संरक्षण या गंभीर लापरवाही के यह संभव नहीं। बहुमूल्य नगरपालिका जमीन पर नियमों के खिलाफ यह कार्रवाई की गई है। 

मुख्य मांगें
जमीन का तत्काल कब्जा लिया जाए। पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

 सबसे बड़ा सवाल
3 साल की लीज आखिर 30 साल का खेल कैसे बन गई?
निरस्त आदेश के बाद भी कब्जा किसके संरक्षण में कायम है?

 सवाल यही है कि जो प्रशासन लगातार अतिक्रमण के खिलाफ कारवाई करके वाहवाही लुट रहा है वो अब  इस बेशकीमती जमीन का कब्जा कब लेता है या मामल सवालों और कार्रवाई के बीच झूलता रहेगा।