जनगणना 2027 में ‘उर्दू’ पर सियासी-सामाजिक अपील: हारून रशीद कुरैशी बोले—मातृभाषा दर्ज कराओ, उर्दू बचाओ
नीमच। जनगणना 2027 की आहट के साथ ही देशभर में हलचल तेज हो गई है। इस बार प्रक्रिया डिजिटल होगी, जहां नागरिक खुद पोर्टल पर अपनी जानकारी भरेंगे। इसी कड़ी में ‘मातृभाषा’ का कॉलम अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि पहचान और प्रतिनिधित्व का मुद्दा बनता जा रहा है।
उर्दू, जो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से एक है, को लेकर बहस और अपील दोनों तेज हैं। हाल ही में Supreme Court of India ने साफ किया कि भाषा का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं होता और उर्दू भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की अहम पहचान है—एक पूरी तरह भारतीय भाषा है।
इसी पृष्ठभूमि में नीमच के पूर्व पार्षद हारून रशीद कुरैशी ने खुलकर अपील की है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से कहा है कि वे बिना झिझक उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराएं। उनका साफ कहना है—यह सिर्फ आंकड़ों की लड़ाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकार और पहचान का सवाल है।
कुरैशी ने जोर देकर कहा कि सही आंकड़े ही नीति तय करते हैं। अगर उर्दू भाषी आबादी का डेटा मजबूत होगा, तभी उर्दू माध्यम के स्कूलों, शिक्षकों और अन्य भाषाई सुविधाओं को लेकर सरकार ठोस फैसले ले पाएगी।
