खंभा चीर कर उतरे ‘न्याय के नख’: नीमच में नरसिंह जयंती ने भक्ति को बना दिया जन-ज्वार
नीमच | नीमच ने गुरुवार को सिर्फ एक त्योहार नहीं मनाया—यह आस्था का उफान था, जहां भीड़ नहीं, विश्वास उमड़ा। घंटाघर स्थित नृसिंह मंदिर में नरसिंह जयंती ने ऐसा रूप लिया, मानो पुराणों का समय शहर की गलियों में उतर आया हो।
सुबह 8:30 बजे जैसे ही वैदिक मंत्रों के बीच अभिषेक शुरू हुआ, मंदिर परिसर श्रद्धा की ऊर्जा से भर गया। घंटियों की गूंज और मंत्रोच्चार के बीच भक्तों की लंबी कतारें—हर चेहरा एक ही प्रार्थना के साथ: “संकट काटो, सुख दो।”
दोपहर 3 बजे महिला मंडल ने 56 भोग अर्पित कर भक्ति को स्वर दिया। भजन-कीर्तन ने माहौल को ऐसा रंग दिया कि मंदिर केवल स्थान नहीं, अनुभव बन गया।
लेकिन असली क्षण शाम ने रचा।
6 बजे शुरू हुई लीला… और ठीक 7:15 पर—वह दृश्य, जिसने सांसें थाम दीं।
खंभा फटा… और न्याय प्रकट हुआ।
भगवान नरसिंह का प्रकट होना सिर्फ मंचन नहीं था—यह उस कहानी का जीवंत बयान था, जहां अहंकार का अंत तय है और आस्था अडिग रहती है। हिरण्यकश्यप का क्रूर चेहरा और प्रह्लाद की निडर भक्ति—दोनों के टकराव ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया।
आरती के साथ जैसे ही “जय श्री नरसिंह” गूंजा, पूरा परिसर एक स्वर में बदल गया। प्रसाद वितरण के बीच भी लोगों के चेहरे पर वही भाव—आस्था, विस्मय और संतोष।
क्यों खास है यह दिन?
पुराण बताते हैं—जब सत्ता अहंकार में अंधी हो जाती है और भक्ति को कुचलने की कोशिश करती है, तब भगवान नियम तोड़कर भी न्याय करते हैं। न दिन, न रात… न भीतर, न बाहर… न अस्त्र, न शस्त्र—इन सब सीमाओं के बीच नरसिंह अवतार का संदेश साफ है:
अन्याय चाहे जितना चतुर हो, अंत तय है।
आयोजन की जानकारी समाज अध्यक्ष ओमप्रकाश बंसल ने दी। लेकिन इस आयोजन की असली पहचान भीड़ या कार्यक्रम नहीं—वह भाव था, जिसने नीमच को एक शाम के लिए धर्म और न्याय की कथा में बदल दिया।
