हिंदुत्व: एक जीवन शैली और समाज में नारी की वास्तविक भूमिका- भैय्याजी जोशी के साथ मातृशक्ति गोष्ठी विमर्श: अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध और एक विनम्र प्रश्न – प्रेरणा ठाकरे
नमस्कार
वंदे मातरम
वंदे मातरम सम्बोधन करते ही मन मस्तिष्क में उस माँ के प्रति अगाध आस्था और गर्व की अनुभूति होने लगती है जिस माँ का नाम भारत माता है। सकल विश्व मे एकमात्र ऐसा देश जिसे माँ कहकर पुकारा जाता है,यही हमारे हिंदुत्व की पहचान है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्वावधान में आयोजित "प्रमुख मातृशक्ति गोष्ठी का हिस्सा बनना अविस्मरणीय अनुभव था। श्री भैया जी जोशी का उद्बोधन केवल उद्बोधन नही बल्कि शहर की सृजन शक्ति से संवाद था। कई आयोजन में वक्ता आकर अपनी बात कहकर चले जाते हैं, किंतु आज के इस आयोजन में देश की चुनोतियों, मुद्दों, प्रश्नों और समाधान पर सार्थक संवाद महिलाओं की सहभागिता की सार्थकता तक पहुंचा।
भैया जी द्वारा महिलाओं के विषय मे प्रमुख चुनोतियो पर जब बात हुई तो तीन प्रमुख चुनोतियाँ सामने आयीं पहली सुरक्षा, दूसरी सम्मान और तीसरी सहभागिता। इनमें से सुरक्षा और सम्मान तो फिर भी विचाराधीन हैं किंतु सहभागिता पर अभी तक कोई सार्थक चर्चा नही हो सकी है,चाहे घर हो या समाज महिलाओं के हाथ मे निर्णय का अधिकार आना शेष है। भैया जी द्वारा जब हिन्दू क्या है पर सदन में प्रश्न रखा गया तब भी कई महिलाओं ने अपने विचार प्रस्तुत किये जिसका विश्लेषण करें तो कह सकते हैं कि हिन्दू एक धर्म या जाति नही बल्कि एक सुगठित जीवन शैली है। तिलक लगाना, पूजा करना ही हिन्दू होना नही अपितु जीवन के शाश्वत मूल्यों की रक्षा करना हिन्दू होना है। रोचक बात यह थी कि जब अगला प्रश्न पूछा गया कि ऐसा क्या है जो समाज मे अब स्वीकार्य हो,कुछ ऐसा जो संरक्षित किया जा सके और कुछ वह भी जिसे करने से रोका जाना आवश्यक हो। फिर क्या था मातृशक्ति में विचारों की झड़ी सी लग गयी। मेरा व्यक्तिगत मत है कि समाज मे भारतीय वेशभूषा के पक्षधर होना अच्छी बात है किंतु सर पर पल्लू ना भी हो तो स्वीकार करना चाहिए, घर और बाहर जब पुरुष और स्त्री दोनों कामकाजी हों तो घर के काम मे पुरुषों की सहभागिता भी तय होनी चाहिए। संरक्षित होना चाहिए रसोई का स्वाद और पुरातन तीज त्यौहार और परंपरा। आभूषणों की उपेक्षा नही होनी चाहिए वे सौन्दर्य का बंधन नही बल्कि वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात कि महिलाओं को अधिकारों के साथ ही कर्तव्यों के प्रति भी शिक्षित किया जाए। माताएं बेटियों को छोटे कपड़े पहनाकर समाज को दृष्टिकोण सुधारने की हिदायत देने की बजाय उन्हें शिष्ट कपड़े पहनना सिखाएं, शिक्षित करने के साथ ही गृहकार्य में भी दक्ष करें। कुल मिलाकर आज की यह प्रमुख मातृशक्ति गोष्ठी भैया जी जोशी के मार्गदर्शन में संस्कारों की पाठशाला रही। घर वही है जहाँ अच्छे संस्कार, अच्छे विचार और अच्छी आदतों के बीज बोए जाते हैं और सृष्टि की सृजनकर्ता महिला इस पाठशाला का अहम केंद्र बिंदु है।
जाते जाते मैं एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहती हूं कि समाज,घर हर जगह महिलाओं की सहभागिता की बात करने वाले स्वयंसेवक संघ में आज तक किसी बड़े पद पर महिला की सहभागिता तय क्यों नही की गई। यह आरोप नही बल्कि मातृगोष्ठी में हुए सार्थक संवाद से उपजा एक विनम्र प्रश्न है। यह प्रश्न कितना सार्थक है ये आप स्वयं तय करते हुए समाधान तक जरुर पहुंचेंगे यही अपेक्षा है।
डॉ प्रेरणा ठाकरे
कवयित्री एवं समाजसेवी नीमच
